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हयो॒ न वि॒द्वाँ अ॑युजि स्व॒यं धु॒रि तां व॑हामि प्र॒तर॑णीमव॒स्युव॑म्। नास्या॑ वश्मि वि॒मुचं॒ नावृतं॒ पुन॑र्वि॒द्वान्प॒थः पु॑रए॒त ऋ॒जु ने॑षति ॥१॥

English Transliteration

hayo na vidvām̐ ayuji svayaṁ dhuri tāṁ vahāmi prataraṇīm avasyuvam | nāsyā vaśmi vimucaṁ nāvṛtam punar vidvān pathaḥ puraeta ṛju neṣati ||

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Pad Path

हयः॑। न। वि॒द्वान्। अ॒यु॒जि॒। स्व॒यम्। धु॒रि। ताम्। व॒हा॒मि॒। प्र॒ऽतर॑णीम्। अ॒व॒स्युव॑म्। न। अ॒स्याः॒। व॒श्मि॒। वि॒ऽमुच॑म्। न। आ॒ऽवृत॑म्। पुनः॑। वि॒द्वान्। प॒थः। पु॒रः॒ऽए॒ता। ऋ॒जु। ने॒ष॒ति॒ ॥१॥

Rigveda » Mandal:5» Sukta:46» Mantra:1 | Ashtak:4» Adhyay:2» Varga:28» Mantra:1 | Mandal:5» Anuvak:4» Mantra:1


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SWAMI DAYANAND SARSWATI

अब आठ ऋचावाले छयालीसवें सूक्त का प्रारम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में शिल्पविद्या का विद्वान् रथों को रचकर सुख से मार्ग को जाता है, इस विषय को कहते हैं ॥

Word-Meaning: - हे मनुष्यो ! (विद्वान्) विद्यायुक्त मैं (स्वयम्) आप (अयुजि) नहीं संयुक्त (धुरि) मार्ग में (हयः) उत्तम प्रकार शिक्षायुक्त घोड़े के (न) सदृश (ताम्, प्रतरणीम्) पार होते हैं जिससे उस (अवस्युवम्) अपनी रक्षा की इच्छा करती हुई को (वहामि) प्राप्त होता वा प्राप्त कराता हूँ और (अस्याः) इसके सम्बन्ध में (विमुचम्) त्यागते हैं जिससे उसकी (न) नहीं (वश्मि) कामना करता हूँ और (न) नहीं (आवृतम्) ढँपे हुए की कामना करता हूँ (पुनः) फिर (पुरएता) प्रथम जानेवाला (विद्वान्) विद्यायुक्त जन (ऋजु) सरलता जैसे हो, वैसे (पथः) मार्गों को (नेषति) प्राप्त करावे ॥१॥
Connotation: - इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे विद्वानों से उत्तम प्रकार शिक्षित घोड़े कार्यों को सिद्ध करते हैं, वैसे ही प्राप्त हुई विद्या और शिक्षा जिनको, ऐसे मनुष्य कार्य्य की सिद्धि को प्राप्त होते हैं ॥१॥
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SWAMI DAYANAND SARSWATI

अथ शिल्पविद्याविद्वान् यानानि निर्माय सुखेन पन्थानं गच्छतीत्याह ॥

Anvay:

हे मनुष्या ! विद्वानहं स्वयमयुजि धुरि हयो न तां प्रतरणीमवस्युवं वहामि। अस्या विमुचं न वश्मि न आवृतं वश्मि पुनः पुरएता विद्वानृजु पथो नेषति ॥१॥

Word-Meaning: - (हयः) सुशिक्षितोऽश्वः (न) इव (विद्वान्) (अयुजि) असंयुक्तायाम् (स्वयम्) (धुरि) मार्गे (ताम्) (वहामि) प्राप्नोमि प्रापयामि वा (प्रतरणीम्) प्रतरन्ति यया ताम् (अवस्युवम्) आत्मनोऽवमिच्छन्तीम् (न) (अस्याः) (वश्मि) कामये (विमुचम्) विमुचन्ति येन तम् (न) (आवृतम्) आच्छादितम् (पुनः) (विद्वान्) (पथः) (पुरएता) पूर्वं गन्ता (ऋजु) सरलम् (नेषति) नयेत् ॥१॥
Connotation: - अत्रोपमालङ्कारः। यथा विद्वद्भिः सुशिक्षिता अश्वाः कार्य्याणि साध्नुवन्ति तथैव प्राप्तविद्याशिक्षा मनुष्याः कार्यसिद्धिमाप्नुवन्ति ॥१॥
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MATA SAVITA JOSHI

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Connotation: - या मंत्रात उपमालंकार आहे. जसे विद्वानांकडून उत्तम प्रकारे प्रश्क्षिित घोडे कार्य पूर्ण करतात तसे विद्या प्राप्ती व शिक्षण याद्वारे कार्य सिद्ध होते. ॥ १ ॥