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आ सूर्यो॑ यातु स॒प्ताश्वः॒ क्षेत्रं॒ यद॑स्योर्वि॒या दी॑र्घया॒थे। र॒घुः श्ये॒नः प॑तय॒दन्धो॒ अच्छा॒ युवा॑ क॒विर्दी॑दय॒द्गोषु॒ गच्छ॑न् ॥९॥

English Transliteration

ā sūryo yātu saptāśvaḥ kṣetraṁ yad asyorviyā dīrghayāthe | raghuḥ śyenaḥ patayad andho acchā yuvā kavir dīdayad goṣu gacchan ||

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Pad Path

आ। सूर्यः॑। या॒तु॒। स॒प्तऽअ॑श्वः। क्षेत्र॑म्। यत्। अ॒स्य॒। उ॒र्वि॒या। दी॒र्घ॒ऽया॒थे। र॒घुः। श्ये॒नः। प॒त॒य॒त्। अन्धः॑। अच्छ॑। युवा॑। क॒विः। दी॒द॒य॒त्। गोषु॑। गच्छ॑न् ॥९॥

Rigveda » Mandal:5» Sukta:45» Mantra:9 | Ashtak:4» Adhyay:2» Varga:27» Mantra:4 | Mandal:5» Anuvak:4» Mantra:9


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SWAMI DAYANAND SARSWATI

फिर सूर्य्य के समान मनुष्य क्या करें, उसका उपदेश करते हैं ॥

Word-Meaning: - हे मनुष्यो ! जैसे (सप्ताश्वः) सात प्रकार शीघ्र चलनेवाली किरणें जिसकी ऐसा (सूर्य्यः) सूर्य्य (यत्) जिस (क्षेत्रम्) निवास के स्थान को (अस्य) इस जगत् सम्बन्धिनी (उर्विया) पृथिवी के (दीर्घयाथे) चलें जिसमें ऐसे बड़े मार्ग में (रघुः) लघु (श्येनः) अन्तरिक्षस्थ वाज पक्षी के सदृश अन्तरिक्ष में जाता है, वैसे आप सेना के मध्य में (आ) सब प्रकार से (यातु) प्राप्त हूजिये और जैसे (गोषु) पृथिवियों में (गच्छन्) चलता हुआ (दीदयत्) प्रकाश करता है, वैसे (युवा) मिले और नहीं मिले हुए को करनेवाले यौवनावस्थायुक्त (कविः) बुद्धिमान् विद्वान् (अच्छा) उत्तम प्रकार (अन्धः) अन्न आदि का (पतयत्) स्वामी के सदृश आचरण करता है, यह जानो ॥९॥
Connotation: - इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है । हे मनुष्यो ! जिस सूर्य्य में सात तत्त्व हैं और जो अपने चक्र को छोड़ के इधर-उधर नहीं जाता है और बहुत भूगोलों के मध्य में एक ही प्रकाशित है, वैसे ही सब पुरुष होवें ॥९॥
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SWAMI DAYANAND SARSWATI

पुनः सूर्य्यवन्मनुष्याः किं कुर्य्युरित्युपदिश्यते ॥

Anvay:

हे मनुष्या ! यथा सप्ताश्वः सूर्य्यो यत् क्षेत्रमस्योर्विया दीर्घयाथे रघुः श्येन इवान्तरिक्षे याति तथा भवान् सेनाया मध्य आ यातु यथा गोषु गच्छन् दीदयत्तथा युवा कविरच्छान्धः पतयदिति विजानीत ॥९॥

Word-Meaning: - (आ) समन्तात् (सूर्य्यः) सविता (यातु) गच्छतु (सप्ताश्वः) सप्तविधा अश्वा आशुगामिनः किरणा यस्य सः (क्षेत्रम्) निवासस्थानम् (यत्) (अस्य) (उर्विया) पृथिव्याः (दीर्घयाथे) यान्ति यस्मिन्त्स याथो मार्गः दीर्घश्चासौ याथस्तस्मिन् (रघुः) लघुः (श्येनः) अन्तरिक्षस्थः श्येन इव (पतयत्) पतिरिवाचरति (अन्धः) अन्नादिकम् (अच्छा) अत्र संहितायामिति दीर्घः। (युवा) मिश्रितामिश्रितकर्त्ता यौवनावस्थः (कविः) मेधावी विद्वान् (दीदयत्) प्रकाशयति (गोषु) पृथिवीषु (गच्छन्) ॥९॥
Connotation: - अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः । हे मनुष्या ! यस्मिन् सूर्ये सप्त तत्त्वानि सन्ति यः स्वक्षेत्रं विहाय इतस्ततो नो गच्छति तथा बहूनां भूगोलानां मध्य एकः सन् प्रकाशते तथैव सर्वे पुरुषा भवन्तु ॥९॥
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MATA SAVITA JOSHI

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Connotation: - या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. हे माणसांनो! ज्या सूर्यात सात तत्त्व आहेत तो स्वक्षेत्र सोडून इकडे तिकडे जात नाही. मोठ्या भूगोलात एकटाच प्रकाशमय आहे. तसेच सर्व पुरुषांनी (तेजस्वी) व्हावे. ॥ ९ ॥