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य ओह॑ते र॒क्षसो॑ दे॒ववी॑तावच॒क्रेभि॒स्तं म॑रुतो॒ नि या॑त। यो वः॒ शमीं॑ शशमा॒नस्य॒ निन्दा॑त्तु॒च्छ्यान्कामा॑न्करते सिष्विदा॒नः ॥१०॥

English Transliteration

ya ohate rakṣaso devavītāv acakrebhis tam maruto ni yāta | yo vaḥ śamīṁ śaśamānasya nindāt tucchyān kāmān karate siṣvidānaḥ ||

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Pad Path

यः। ओह॑ते। र॒क्षसः॑। दे॒वऽवी॑तौ। अ॒च॒क्रेभिः॑। तम्। म॒रु॒तः॒। नि। या॒त॒। यः। वः॒। शमी॑म्। श॒श॒मा॒नस्य॑। निन्दा॑त्। तु॒च्छ्यान्। कामा॑न्। क॒र॒ते॒। सि॒स्वि॒दा॒नः ॥१०॥

Rigveda » Mandal:5» Sukta:42» Mantra:10 | Ashtak:4» Adhyay:2» Varga:18» Mantra:5 | Mandal:5» Anuvak:3» Mantra:10


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SWAMI DAYANAND SARSWATI

फिर शिक्षाविषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

Word-Meaning: - हे (मरुतः) मनुष्यो ! (यः) जो (देववीतौ) देव अर्थात् विद्वानों से व्याप्त क्रिया में (रक्षसः) दुष्ट आचरणयुक्त मनुष्यों को (ओहते) प्राप्त कराता है (यः) जो (वः) आप लोगों और (शशमानस्य) प्रशंसा किये गये के (शमीम्) कर्म्म की (निन्दात्) निन्दा करे और (सिष्विदानः) संलग्न हुआ (तुच्छ्यान्) क्षुद्रों में हुए (कामान्) मनोरथों को (करते) करे (तम्) उसको (अचक्रेभिः) चक्रों से रहितों के द्वारा दण्ड से (नि, यात) निरन्तर प्राप्त हूजिये ॥१०॥
Connotation: - हे राजा आदि मनुष्यो ! जो बुरी शिक्षा से मनुष्यों को दूषित करते और निन्दा तथा विषयों की आसक्ति में प्रवृत्त कराते हैं, उनको निरन्तर दण्ड दीजिये ॥१०॥
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SWAMI DAYANAND SARSWATI

पुनः शिक्षाविषयमाह ॥

Anvay:

हे मरुतो ! यो देववीतौ रक्षस ओहते यो वः शशमानस्य च शमीं निन्दात् सिष्विदानः सँस्तुच्छ्यान् कामान् करते तमचक्रेर्भिर्दण्डेन नि यात ॥१०॥

Word-Meaning: - (यः) (ओहते) वहति प्रापयति (रक्षसः) दुष्टाचारान् मनुष्यान् (देववीतौ) देवैर्विद्वद्भिर्व्याप्तायां क्रियायाम् (अचक्रेभिः) अविद्यमानचक्रैः (तम्) (मरुतः) मनुष्याः (नि) (यात) प्राप्नुत (यः) (वः) युष्माकम् (शमीम्) कर्म्म (शशमानस्य) प्रशंसितस्य (निन्दात्) निन्देत् (तुच्छ्यान्) तुच्छेषु क्षुद्रेषु भवान् (कामान्) (करते) कुर्य्यात् (सिष्विदानः) स्निह्यमानः ॥१०॥
Connotation: - हे राजादयो मनुष्या भवन्तो ये कुशिक्षया मनुष्यान् दूषयन्ति निन्दायां विषयासक्तौ च प्रवर्त्तयन्ति तान् भृशं दण्डयन्तु ॥१०॥
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MATA SAVITA JOSHI

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Connotation: - हे राजा इत्यादींनो! जे कु शिक्षणाद्वारे माणसांमध्ये दोष उत्पन्न करतात, निंदा करतात व विषयासक्तीमध्ये प्रवृत्त करवितात, त्यांना सतत दंड द्या. ॥ १० ॥