Go To Mantra

ह॒व्य॒वाळ॒ग्निर॒जरः॑ पि॒ता नो॑ वि॒भुर्वि॒भावा॑ सु॒दृशी॑को अ॒स्मे। सु॒गा॒र्ह॒प॒त्याः समिषो॑ दिदीह्यस्म॒द्र्य१॒॑क्सं मि॑मीहि॒ श्रवां॑सि ॥२॥

English Transliteration

havyavāḻ agnir ajaraḥ pitā no vibhur vibhāvā sudṛśīko asme | sugārhapatyāḥ sam iṣo didīhy asmadryak sam mimīhi śravāṁsi ||

Mantra Audio
Pad Path

ह॒व्य॒ऽवाट्। अ॒ग्निः। अ॒जरः॑। पि॒ता। नः॒। वि॒ऽभुः। वि॒भाऽवा॑। सु॒ऽदृशी॑कः। अ॒स्मे इति॑। सु॒ऽगा॒र्ह॒प॒त्याः। सम्। इषः॑। दि॒दी॒हि॒। अ॒स्म॒द्र्य॑क्। सम्। मि॒मी॒हि॒। श्रवां॑सि ॥२॥

Rigveda » Mandal:5» Sukta:4» Mantra:2 | Ashtak:3» Adhyay:8» Varga:18» Mantra:2 | Mandal:5» Anuvak:1» Mantra:2


Reads times

SWAMI DAYANAND SARSWATI

फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

Word-Meaning: - हे राजन् जैसे (हव्यवाट्) द्रव्यों को एक स्थान से दूसरे स्थान में पहुँचाने वा (सुदृशीकः) उत्तम प्रकार देखने वा दिखानेवाला (अग्निः) शुद्धस्वरूप अग्नि जैसे (विभुः) व्यापक परमेश्वर के सदृश सब का पालन करता और प्रकाशित होता है, वैसे (विभावा) अनेक प्रकार के प्रकाश वा ज्ञान से युक्त (अजरः) वृद्धावस्थारहित (नः) हम लोगों के (पिता) पालन करनेवाले होते हुए (अस्मे) हम लोगों के लिये (सुगार्हपत्याः) सुन्दर अग्नि आदि पदार्थ समुदायवाले (इषः) अन्नों को (सम्, दिदीहि) अच्छे प्रकार दीजिये और (अस्मद्र्यक्) हम लोगों का आदर करने, जानने वा जनानेवाले होते हुए (श्रवांसि) पढ़ने और पढ़ाने आदि कर्म्मों का (सम्, मिमीहि) विधान करिये ॥२॥
Connotation: - इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है । हे राजन् ! जैसे बिजुली और भूमि में प्रसिद्ध हुए रूप से अग्नि सब का उपकार करता है और जैसे परमेश्वर असंख्यात पदार्थों के उत्पन्न करने से पितरों के सदृश सब का पालन करता है, वैसे ही आप हूजिये ॥२॥
Reads times

SWAMI DAYANAND SARSWATI

पुनस्तमेव विषयमाह ॥

Anvay:

हे राजन् ! यथा हव्यवाट् सुदृशीकोऽग्निः पावको यथा विभुरीश्वरवत् सर्वं पाति प्रकाशते तथा विभावाऽजरो नः पिता सन्नस्मे सुगार्हपत्या इषः सन् दिदीहि अस्मद्र्यक् सन् श्रवांसि सं मिमीहि ॥२॥

Word-Meaning: - (हव्यवाट्) यो हव्यानि द्रव्याणि देशान्तरं प्रापयति (अग्निः) शुद्धस्वरूपः (अजरः) अवृद्धः (पिता) पालकः (नः) अस्माकम् (विभुः) व्यापकः परमेश्वरवत् (विभावा) विविधभानवान् (सुदृशीकः) दर्शयिता वा (अस्मे) अस्मभ्यम् (सुगार्हपत्याः) शोभनो गार्हपत्योऽग्न्यादिपदार्थसमुदायो यासान्ताः (सम्) (इषः) अन्नानि (दिदीहि) देहि (अस्मद्र्यक्) योऽस्मानञ्चति जानाति ज्ञापयति वा (सम्) (मिमीहि) विधेहि (श्रवांसि) अध्ययनाध्यापनादीनि कर्माणि ॥२॥
Connotation: - अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः । हे राजन् ! यथा विद्युद्भौमरूपेणाग्निः सर्वानुपकरोति यथा च परमेश्वरोऽसङ्ख्यातपदार्थानामुत्पादनेन पितृवत्सर्वान् पालयति तथैव त्वं भव ॥२॥
Reads times

MATA SAVITA JOSHI

N/A

Word-Meaning: - N/A
Connotation: - या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. हे राजा ! जशी विद्युत व भूमीतील अग्नी सर्वांवर उपकार करतो व जसे परमेश्वर असंख्य पदार्थ उत्पन्न करून पित्याप्रमाणे सर्वांचे पालन करतो तसे तूही कर. ॥ २ ॥