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दे॒वैर्नो॑ दे॒व्यदि॑ति॒र्नि पा॑तु दे॒वस्त्रा॒ता त्रा॑यता॒मप्र॑युच्छन्। न॒हि मि॒त्रस्य॒ वरु॑णस्य धा॒सिमर्हा॑मसि प्र॒मियं॒ सान्व॒ग्नेः ॥७॥

English Transliteration

devair no devy aditir ni pātu devas trātā trāyatām aprayucchan | nahi mitrasya varuṇasya dhāsim arhāmasi pramiyaṁ sānv agneḥ ||

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Pad Path

दे॒वैः। नः॒। दे॒वी। अदि॑तिः। नि। पा॒तु॒। दे॒वः। त्रा॒ता। त्रा॒य॒ता॒म्। अप्र॑ऽयुच्छन्। न॒हि। मि॒त्र॑स्य। वरु॑णस्य। धा॒सिम्। अर्हा॑मसि। प्रऽमिय॑म्। सानु॑। अ॒ग्नेः ॥७॥

Rigveda » Mandal:4» Sukta:55» Mantra:7 | Ashtak:3» Adhyay:8» Varga:7» Mantra:2 | Mandal:4» Anuvak:5» Mantra:7


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SWAMI DAYANAND SARSWATI

फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

Word-Meaning: - हे विद्वन् ! जैसे हम लोग (वरुणस्य) श्रेष्ठ पुरुष (मित्रस्य) मित्र और (अग्नेः) अग्नि के (सानु) शिखर और (धासिम्) अन्न के (प्रमियम्) नाश करने को (नहि) नहीं (अर्हामसि) योग्य होते हैं, वैसे (देवैः) विद्वानों वा पृथिवी आदिकों के साथ (देवी) प्रकाशमान विद्यायुक्त माता (अदितिः) अखण्डित ज्ञानवाली (नः) हम लोगों की (नि, पातु) रक्षा करे और (अप्रयुच्छन्) नहीं प्रमाद करता हुआ (त्राता) रक्षा करनेवाला (देवः) विद्वान् पिता हम लोगों का (त्रायताम्) पालन करे ॥७॥
Connotation: - इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। प्रत्येक मनुष्य को चाहिये कि किसी सज्जन वा किसी पदार्थ का नाश और नशा करनेवाले द्रव्य का सेवन सदा ही न करे और सदा विद्वानों और माता-पिता की शिक्षा को ग्रहण करे ॥७॥
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SWAMI DAYANAND SARSWATI

पुनस्तमेव विषयमाह ॥

Anvay:

हे विद्वन् ! यथा वयं वरुणस्य मित्रस्याग्नेः सानु धासिं प्रमियं नह्यर्हामसि तथा देवैस्सह देव्यदितिर्नो नि पात्वप्रयुच्छँस्त्राता देवोऽस्माँस्त्रायताम् ॥७॥

Word-Meaning: - (देवैः) विद्वद्भिः पृथिव्यादिभिस्सह वा (नः) अस्मान् (देवी) देदीप्यमाना विदुषी माता (अदितिः) अखण्डितज्ञाना (नि) (पातु) रक्षतु (देवः) विद्वान् पिता (त्राता) रक्षकः (त्रायताम्) पालयतु (अप्रयुच्छन्) अप्रमाद्यन् (नहि) निषेधे (मित्रस्य) (वरुणस्य) (धासिम्) अन्नम् (अर्हामसि) योग्या भवामः (प्रमियम्) प्रहिंसितुम् (सानु) शिखरम् (अग्नेः) पावकस्य ॥७॥
Connotation: - अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। केनाऽपि मनुष्येण कस्याऽपि जनस्य पदार्थस्य वा हिंसा मादकद्रव्यसेवनञ्च सदैव न कार्य्यं सदा विदुषां मातुः पितुश्च शिक्षा सङ्ग्राह्या ॥७॥
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MATA SAVITA JOSHI

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Connotation: - या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. प्रत्येक माणसाने एखाद्या सज्जनाचा किंवा पदार्थाचा नाश करू नये किंवा मादक द्रव्याचे सेवन कधी करू नये व सदैव विद्वान माता-पित्याकडून शिक्षण घ्यावे. ॥ ७ ॥