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यस्त॑ इ॒ध्मं ज॒भर॑त्सिष्विदा॒नो मू॒र्धानं॑ वा त॒तप॑ते त्वा॒या। भुव॒स्तस्य॒ स्वत॑वाँ पा॒युर॑ग्ने॒ विश्व॑स्मात्सीमघाय॒त उ॑रुष्य ॥६॥

English Transliteration

yas ta idhmaṁ jabharat siṣvidāno mūrdhānaṁ vā tatapate tvāyā | bhuvas tasya svatavām̐ḥ pāyur agne viśvasmāt sīm aghāyata uruṣya ||

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Pad Path

यः। ते॒। इ॒ध्मम्। ज॒भर॑त्। सि॒स्वि॒दा॒नः। मू॒र्धान॑म्। वा॒। त॒तप॑ते। त्वा॒ऽया। भुवः॑। तस्य॑। स्वऽत॑वान्। पा॒युः। अ॒ग्ने॒। विश्व॑स्मात्। सी॒म्। अ॒घ॒ऽय॒तः। उ॒रु॒ष्य॒॥६॥

Rigveda » Mandal:4» Sukta:2» Mantra:6 | Ashtak:3» Adhyay:4» Varga:17» Mantra:1 | Mandal:4» Anuvak:1» Mantra:6


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SWAMI DAYANAND SARSWATI

अब अगले मन्त्र में राजविषय को कहते हैं ॥

Word-Meaning: - हे (ततपते) लम्बे चौड़े बिथरे हुए चराचर पदार्थों की पालना करने और (अग्ने) अग्नि पवित्र करनेवाले ! (यः) जो (सिष्विदानः) स्नेहयुक्त (स्वतवान्) अपने से बढ़ा (पायुः) रक्षा करनेवाला (त्वाया) आपको प्राप्त होता (ते) आपकी (भुवः) पृथिवी के (इध्मम्) तपे हुए (मूर्धानम्) मस्तक को (जभरत्) पोषण करता है, उसकी आप (उरुष्य) रक्षा करो (वा) अथवा (तस्य) उसके मस्तक की (सीम्) सब प्रकार रक्षा करो (अघायतः) अपने को पाप की इच्छा करते हुए का (विश्वस्मात्) सब प्रकार से मस्तक काटो ॥६॥
Connotation: - हे मनुष्यो ! जो लोग आप लोगों के प्रताप शरीर और राज्य की रक्षा करके दुष्टों का सब प्रकार नाश करते हैं, उनकी निरन्तर रक्षा करो ॥६॥
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SWAMI DAYANAND SARSWATI

अथ राजविषयमाह ॥

Anvay:

हे ततपतेऽग्ने ! यः सिष्विदानः स्वतवान् पायुस्त्वाया ते भुव इध्मं मूर्धानं जभरत्तं त्वमुरुष्य वा तस्य मूर्धानं सीमुरुष्य। अघायतस्तस्य विश्वस्मान्मूर्धानं छिन्धि ॥६॥

Word-Meaning: - (यः) (ते) तव (इध्मम्) प्रदीप्तम् (जभरत्) बिभर्त्ति (सिष्विदानः) स्नेहयुक्तः (मूर्धानम्) (वा) (ततपते) ततानां विस्तृतानां पालक (त्वाया) यस्त्वामयते (भुवः) पृथिव्याः (तस्य) (स्वतवान्) स्वेन प्रवृद्धः (पायुः) रक्षकः (अग्ने) पावक (विश्वस्मात्) सर्वस्मात् (सीम्) सर्वतः (अघायतः) आत्मनोऽघमिच्छतः (उरुष्य) रक्ष ॥६॥
Connotation: - हे मनुष्या ! ये युष्माकं प्रतापं शरीराणि राज्यं रक्षित्वा दुष्टान् सर्वतो घ्नन्ति तान् सततं रक्षत ॥६॥
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MATA SAVITA JOSHI

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Connotation: - हे माणसांनो ! जे लोक तुमचे शरीर रक्षण व राज्याचे रक्षण करून पराक्रमाने दुष्टांचे सर्व प्रकारे हनन करतात त्यांचे निरंतर रक्षण करा. ॥ ६ ॥