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शु॒नं हु॑वेम म॒घवा॑न॒मिन्द्र॑म॒स्मिन्भरे॒ नृत॑मं॒ वाज॑सातौ। शृ॒ण्वन्त॑मु॒ग्रमू॒तये॑ स॒मत्सु॒ घ्नन्तं॑ वृ॒त्राणि॑ सं॒जितं॒ धना॑नाम्॥

English Transliteration

śunaṁ huvema maghavānam indram asmin bhare nṛtamaṁ vājasātau | śṛṇvantam ugram ūtaye samatsu ghnantaṁ vṛtrāṇi saṁjitaṁ dhanānām ||

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Pad Path

शु॒नम्। हु॒वे॒म॒। म॒घवा॑नम्। इन्द्र॑म्। अ॒स्मिन्। भरे॑। नृऽत॑मम्। वाज॑ऽसातौ। शृ॒ण्वन्त॑म्। उ॒ग्रम्। ऊ॒तये॑। स॒मत्ऽसु॑। घ्नन्त॑म्। वृ॒त्राणि॑। स॒म्ऽजित॑म्। धना॑नाम्॥

Rigveda » Mandal:3» Sukta:49» Mantra:5 | Ashtak:3» Adhyay:3» Varga:13» Mantra:5 | Mandal:3» Anuvak:4» Mantra:5


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SWAMI DAYANAND SARSWATI

फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।

Word-Meaning: - हे मनुष्यो ! हम लोग जिस (इन्द्रम्) परमेश्वर के सदृश वर्त्तमान राजा को (धनानाम्) ऐश्वर्य्यो के (ऊतये) रक्षण आदि के लिये (अस्मिन्) इस (भरे) पालन करने योग्य संसार और (वाजसातौ) अपने-अपने अंश के दानस्वरूप व्यवहार में (नृतमम्) अत्यन्त न्यायकारी (मघवानम्) बहुत ऐश्वर्य्यवाले (समत्सु) संग्रामों में शत्रुओं के (घ्नन्तम्) नाशकर्त्ता (वृत्राणि) धनों को (शृण्वन्तम्) यथावत् सुनते हुए (उग्रम्) दुष्टों के दुःख देने और (सञ्जितम्) जीतनेवाले राजा को प्राप्त होकर (शुनम्) सुख का (हुवेम) स्वीकार करे, उसका आप लोग भी स्वीकार करो ॥५॥
Connotation: - राजाओं को चाहिये कि प्रजाओं में पिता के और ईश्वर के तुल्य वर्त्तमान होकर संपूर्ण प्रजाओं का पालन करें, ऐसा उपदेश दीजिये ॥५॥ इस सूक्त में प्रजा और राजा के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ॥ यह उनचासवाँ सूक्त और तेरहवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
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SWAMI DAYANAND SARSWATI

पुनस्तमेव विषयमाह।

Anvay:

हे मनुष्या वयं यमिन्द्रमिव वर्त्तमानं राजानं धनानामूतयेऽस्मिन् भरे वाजसातौ नृतमं मघवानं समत्सु शत्रुन् घ्नन्तं वृत्राणि शृण्वन्तमुग्रं सञ्जितं राजानं समागत्य शुनं हुवेम तं यूयमपि स्वीकुरुत ॥५॥

Word-Meaning: - (शुनम्) सुखम् (हुवेम) स्वीकुर्याम (मघवानम्) बह्वैश्वर्यम् (इन्द्रम्) परमेश्वरवद्वर्त्तमानं राजानम् (अस्मिन्) (भरे) पालनीये जगति (नृतमम्) अतिशयेन न्यायकारिणम् (वाजसातौ) स्वस्य स्वस्यांशस्य दानमये व्यवहारे (शृण्वन्तम्) यथावच्छ्रोतारम् (उग्रम्) दुष्टानां दुःखप्रदम् (ऊतये) रक्षणाद्याय (समत्सु) सङ्ग्रामेषु (घ्नन्तम्) हन्तारम् (वृत्राणि) धनानि (सञ्जितम्) जयशीलम् (धनानाम्) ऐश्वर्य्याणाम् ॥५॥
Connotation: - राजाभिः प्रजासु पितृवदीश्वरवद्वर्त्तित्वा सर्वस्याः प्रजायाः पालनं कर्त्तव्यमित्युपदिशन्तु ॥५॥ अत्र प्रजाराजधर्मवर्णनादेतदर्थस्य पूर्वसूक्तार्थेन सह सङ्गतिर्वेद्या ॥ इत्येकोनपञ्चाशत्तमं सूक्तं त्रयोदशो वर्गश्च समाप्त॥
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MATA SAVITA JOSHI

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Connotation: - राजे लोकांनी प्रजेमध्ये पिता व ईश्वराप्रमाणे राहावे व संपूर्ण प्रजेचे पालन करावे, असा उपदेश करावा. ॥ ५ ॥