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स॒मु॒द्रेण॒ सिन्ध॑वो॒ याद॑माना॒ इन्द्रा॑य॒ सोमं॒ सुषु॑तं॒ भर॑न्तः। अं॒शुं दु॑हन्ति ह॒स्तिनो॑ भ॒रित्रै॒र्मध्वः॑ पुनन्ति॒ धार॑या प॒वित्रैः॑॥

English Transliteration

samudreṇa sindhavo yādamānā indrāya somaṁ suṣutam bharantaḥ | aṁśuṁ duhanti hastino bharitrair madhvaḥ punanti dhārayā pavitraiḥ ||

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Pad Path

स॒मु॒द्रेण॑। सिन्ध॑वः। याद॑मानाः। इन्द्रा॑य। सोम॑म्। सुषु॑तम्। भर॑न्तः। अं॒शुम्। दु॒ह॒न्ति॒। ह॒स्तिनः॑। भ॒रित्रैः॑। मध्वः॑। पु॒न॒न्ति॒। धार॑या। प॒वित्रैः॑॥

Rigveda » Mandal:3» Sukta:36» Mantra:7 | Ashtak:3» Adhyay:2» Varga:20» Mantra:2 | Mandal:3» Anuvak:3» Mantra:7


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SWAMI DAYANAND SARSWATI

अब राजा और प्रजा के गुणों को अगले मन्त्र में कहते हैं।

Word-Meaning: - जो (समुद्रेण) सागर के साथ (सिन्धवः) नदियाँ जैसे वैसे विद्वानों के साथ मेल करके (इन्द्राय) ऐश्वर्य्य के लिये विद्या की (यादमानाः) याचना करते हुए (सुषुतम्) उत्तम प्रकार उत्पन्न (सोमम्) पदार्थों के समूह को (भरन्तः) धारण और पुष्ट करते हुए (हस्तिनः) उत्तम हाथों से युक्त पुरुष (मध्वः) मधुर गुणसम्बन्धी (पवित्रैः) उत्तम शुद्ध (भरित्रैः) धारण और पोषण किये गये धनों के साथ (धारया) तीक्ष्ण धार से (पुनन्ति) पवित्र करते हैं वे काम को (दुहन्ति) पूर्ण करते हैं ॥७॥
Connotation: - इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सब ओर से जल आदि का ग्रहण कर नदियाँ वेग से समुद्र को प्राप्त हो रत्नवाली और शुद्ध जलयुक्त होती हैं, वैसे ही ब्रह्मचर्य्य से विद्याओं को धारण करके तीक्ष्ण बुद्धि से पूर्णज्ञानवाले हो पवित्र हुए और परमेश्वर को प्राप्त होकर सिद्धियों से परिपूर्ण शुद्ध आनन्दी मनुष्य होते हैं ॥७॥
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SWAMI DAYANAND SARSWATI

अथ राजप्रजागुणानाह।

Anvay:

ये समुद्रेण सिन्धव इव विदुषः सङ्गत्येन्द्राय विद्यां यादमानाः सुषुतमंशुं सोमं भरन्तो हस्तिनो मध्वः पवित्रैर्भरित्रैर्धारया पुनन्ति ते कामं दुहन्ति ॥७॥

Word-Meaning: - (समुद्रेण) सागरेण सह (सिन्धवः) नद्य इव (यादमानाः) याचमानाः (इन्द्राय) ऐश्वर्य्याय (सोमम्) पदार्थसमूहम् (सुषुतम्) सुष्ठु निष्पादितम् (भरन्तः) धरन्तः पुष्णन्तः (अंशुम्) सारम् (दुहन्ति) पिपुरति (हस्तिनः) प्रशस्ता हस्ता विद्यन्ते येषान्ते (भरित्रैः) धृतैः पोषितैः साधनैः (मध्वः) मधुरस्य (पुनन्ति) (धारया) (पवित्रैः) शुद्धैः ॥७॥
Connotation: - अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। यथा सर्वतो जलादिकं हृत्वा नद्यो वेगेन गत्वा समुद्रं प्राप्य रत्नवत्यः सत्यः शुद्धजला भवन्ति तथैव ब्रह्मचर्य्येण विद्या धृत्वा तीव्रसंवेगेनालंज्ञाना भूत्वा पवित्रोपचिताः परमेश्वरं प्राप्य सिद्धिमन्तो भूत्वा शुद्धाऽऽनन्दा मनुष्या जायन्ते ॥७॥
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MATA SAVITA JOSHI

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Connotation: - या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. सगळीकडून जल ग्रहण करून व प्रवाहित करून नद्या जशा वेगाने समुद्राला मिळून रत्न व शुद्ध जल यांनी युक्त होतात, तशीच माणसे ब्रह्मचर्याने विद्या धारण करून तीक्ष्ण बुद्धीने पूर्ण ज्ञानवान बनून पवित्र होऊन परमेश्वराला प्राप्त करून सिद्धींनी परिपूर्ण शुद्ध व आनंदी बनतात. ॥ ७ ॥