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स्व॒स्तिरिद्धि प्रप॑थे॒ श्रेष्ठा॒ रेक्ण॑स्वत्य॒भि या वा॒ममेति॑ । सा नो॑ अ॒मा सो अर॑णे॒ नि पा॑तु स्वावे॒शा भ॑वतु दे॒वगो॑पा ॥

English Transliteration

svastir id dhi prapathe śreṣṭhā rekṇasvaty abhi yā vāmam eti | sā no amā so araṇe ni pātu svāveśā bhavatu devagopā ||

Pad Path

स्व॒स्तिः । इत् । हि । प्रऽप॑थे । श्रेष्ठा॑ । रेक्ण॑स्वती । अ॒भि । या । वा॒मम् । एति॑ । सा । नः॒ । अ॒मा । सो इति॑ । अर॑णे । नि । पा॒तु॒ । सु॒ऽआ॒वे॒शा । भ॒व॒तु॒ । दे॒वऽगो॑पा ॥ १०.६३.१६

Rigveda » Mandal:10» Sukta:63» Mantra:16 | Ashtak:8» Adhyay:2» Varga:5» Mantra:6 | Mandal:10» Anuvak:5» Mantra:16


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BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (स्वस्तिः-इत्-हि) कल्याण भावना ही (प्रपथे) पथाग्र-मार्ग के प्रारम्भ में (श्रेष्ठा) श्रेष्ठरूप (रेक्णस्वती) धनधान्यवाली (या वामम्-अभ्येति) जो सेवन करनेवालों को प्राप्त होती है (सा नः) वह हमें (अमा) घर में (सा नु-अरणे) वह ही जंगल में (निपातु) निरन्तर रक्षा करे (देवगोपा स्वावेशा भवतु) विद्वानों द्वारा सुरक्षित शोभन प्रवेशवाली होवे ॥१६॥
Connotation: - विद्वानों द्वारा कल्याणभावना तथा रक्षा जीवन के प्रारम्भिक मार्ग पर, घर में अथवा जंगल में हमें सदा प्राप्त होती रहे, ऐसा सदा यत्न करना चाहिए ॥१६॥
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BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (स्वस्तिः-इत्-हि) स्वस्तिः कल्याणभावना खल्वेव (प्रपथे) पथाग्रे (श्रेष्ठा) श्रेष्ठरूपा (रेक्णस्वती) धनधान्यवती (या वामम्-अभ्येति) या वनयितारं सम्भजयितारं प्राप्नोति (सा नः) साऽस्मान् (अमा) गृहे “अमा गृहनाम” [निघ० ३।४] (सा नः-अरणे) सा हि अरण्ये (नि पातु) निरन्तरं रक्षतु (देवगोपा स्वावेशा भवतु) देवैर्विद्वद्भी रक्षिता शोभनावेशयित्री भवतु ॥१६॥