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इ॒दं त॒ एकं॑ प॒र ऊ॑ त॒ एकं॑ तृ॒तीये॑न॒ ज्योति॑षा॒ सं वि॑शस्व । सं॒वेश॑ने त॒न्व१॒॑श्चारु॑रेधि प्रि॒यो दे॒वानां॑ पर॒मे ज॒नित्रे॑ ॥

English Transliteration

idaṁ ta ekam para ū ta ekaṁ tṛtīyena jyotiṣā saṁ viśasva | saṁveśane tanvaś cārur edhi priyo devānām parame janitre ||

Pad Path

इ॒दम् । ते॒ । एक॑म् । प॒रः । ऊँ॒ इति॑ । ते॒ । एक॑म् । तृ॒तीये॑न । ज्योति॑षा । सम् । वि॒श॒स्व॒ । स॒म्ऽवेश॑ने । त॒न्वः॑ । चारुः॑ । ए॒धि॒ । प्रि॒यः । दे॒वाना॑म् । प॒र॒मे । ज॒नित्रे॑ ॥ १०.५६.१

Rigveda » Mandal:10» Sukta:56» Mantra:1 | Ashtak:8» Adhyay:1» Varga:18» Mantra:1 | Mandal:10» Anuvak:4» Mantra:1


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BRAHMAMUNI

इस सूक्त में ‘विश्वेदेवाः’ से पारिवारिक जन तथा विद्वान् गृहीत हैं। गुणकर्मानुसार विवाह, संयम से गृहस्थचालन, सन्तान की विद्यायोग्यता बनाना, आत्मा द्वारा परम्परा से जन्मधारण और मोक्षप्राप्ति आदि वर्णन है।

Word-Meaning: - (ते) हे आत्मन् ! तेरा (इदम्-एकम्) यह शरीर एक आश्रयस्थान है (ते परः-उ-एकम्) तेरा परजन्म-अगला जन्म दूसरा स्थान है, परन्तु (तृतीयेन ज्योतिषा सं विशस्व) तृतीय स्थानभूत मोक्षस्थान को परमात्मज्योति से प्राप्त कर (तन्वः संवेशने चारुः-एधि) शरीर के लयस्थान मोक्ष में-तेरे तृतीय स्थान में तू अच्छी प्रकार रमणशील हो-स्वतन्त्र हो (परमे जनित्रे) उस अध्यात्म जन्म में-मोक्ष में (देवानां प्रियः) मुक्तों का प्रिय हो ॥१॥
Connotation: - जीवात्मा का वर्त्तमान जन्म यह शरीर इस समय है। यही केवल नहीं, अपितु अगला जन्म भी इसका है। इस प्रकार बार-बार जन्म लेना इसका परम्परा से चला आता है। परन्तु जब ये परमात्मज्योति को अपने अन्दर समा लेता है, तो इन दोनों जन्मों को त्यागकर या जन्म-जन्मान्तर के क्रम को त्यागकर तीसरे अध्यात्मस्थान मोक्ष को प्राप्त होता है, जहाँ ये अव्याध गति से विचरता हुआ मुक्तों की श्रेणी में आ जाता है ॥१॥
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BRAHMAMUNI

अत्र ‘विश्वेदेवाः’ पारिवारिकजनास्तथा विद्वांसो गृह्यन्ते। गुणकर्मानुरूपो विवाहः, संयमेन गृहस्थचालनम्, सन्तानस्य विद्यायोग्यते सम्पादनीये आत्मनः परम्परातो जन्मधारणं मोक्षश्चोपदिश्यते।

Word-Meaning: - (ते) हे आत्मन् ! तव (इदम्-एकम्) इदं शरीरमेकं स्थानमाश्रयस्थानम् (ते परः-उ-एकम्) तव परोभूतं परजन्म खलु ह्येकं स्थानम्, परन्तु (तृतीयेन ज्योतिषा सम्-विशस्व) तृतीयस्थानभूतेन परमात्मज्योतिषा मोक्षस्थानं संविशस्व सम्प्राप्नुहि (तन्वः संवेशने चारुः-एधि) शरीरस्य संवेशने लयस्थाने यत्र शरीरं लीनं भवति तथाभूते मोक्षे तृतीयस्थाने त्वं चारुश्चरणशीलोऽबद्धः स्वतन्त्रो भव (परमे जनित्रे) तत् परमे जन्मनि-अध्यात्मजन्मनि मोक्षे (देवानां प्रियः) मुक्तानां प्रियो भव ॥१॥