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विश्वो॒ ह्य१॒॑न्यो अ॒रिरा॑ज॒गाम॒ ममेदह॒ श्वशु॑रो॒ ना ज॑गाम । ज॒क्षी॒याद्धा॒ना उ॒त सोमं॑ पपीया॒त्स्वा॑शित॒: पुन॒रस्तं॑ जगायात् ॥

English Transliteration

viśvo hy anyo arir ājagāma mamed aha śvaśuro nā jagāma | jakṣīyād dhānā uta somam papīyāt svāśitaḥ punar astaṁ jagāyāt ||

Pad Path

विश्वः॑ । हि । अ॒न्यः । अ॒रिः । आ॒ज॒गाम॑ । मम॑ । इत् । अह॑ । श्वशु॑रः । न । आ । ज॒गा॒म॒ । ज॒क्षी॒यात् । धा॒नाः । उ॒त । सोम॑म् । प॒पी॒या॒त् । सुऽआ॑शितः । पुनः॑ । अस्त॑म् । ज॒गा॒या॒त् ॥ १०.२८.१

Rigveda » Mandal:10» Sukta:28» Mantra:1 | Ashtak:7» Adhyay:7» Varga:20» Mantra:1 | Mandal:10» Anuvak:2» Mantra:1


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BRAHMAMUNI

इस सूक्त में इन्द्र शब्द आत्मा और राजा का द्योतक है। शरीरपोषण और राष्ट्रसमृद्धि के प्रकार वर्णित हैं।

Word-Meaning: - (विश्वः-अन्यः-अरिः-हि) शरीर का सब अन्य स्वामिवर्ग-प्राणगण (आजगाम) प्राप्त हो गया-प्रकट हो गया (अह) खेद है कि (मम-इत्) मेरा ही (श्वशुरः-न-आजगाम) शु-शीघ्र अशुर-प्रापणशील आत्मा मुझ देह का नहीं आया-प्रकट हुआ या राजनीति का चालक राजा स्थापित नहीं हुआ, यह वसुक्र आत्मा के वास-शरीर को करनेवाला प्राण या राष्ट्र में राष्ट्रमन्त्री है (धानाः-जक्षीयात्-उत सोमं पपीयात्) शरीर में प्राण या राष्ट्रमन्त्री अन्न भोगों को भोगे, सोमादि ओषधिरसों का पान करे (सु-आशितः पुनः-अस्तं जगायात्) भोगों को भली प्रकार भोगकर पुनः अपने अमृतघर-मोक्ष को या स्वप्रतिष्ठापद को प्राप्त होवे ॥१॥
Connotation: - जब शरीर बनना आरम्भ होता है, तब प्राण प्रथम से ही अपना कार्य आरम्भ कर देता है। आत्मा उस समय स्वज्ञानशक्ति से कार्य आरम्भ नहीं करता है। जब वह कार्य आरम्भ करने लगता है, तब जन्म पाकर संसार में अन्नादि को भोगता है और सोमादि ओषधियों का रस पान करता है। इस प्रकार संसार के भोगों को भोगकर वह अमर धाम मोक्ष को भी प्राप्त होता है। इस प्रकार राष्ट्र में राष्ट्रमन्त्री प्रथम राष्ट्र की व्यवस्था करता है। पुनः राष्ट्रपतिशासन अधिकार सम्भालता है। वह राष्ट्र में भाँति-भाँति के भोगों को भोगता है और सोमादि ओषधियों का रसपान करता है, अपने ऊँचे प्रतिष्ठापद को प्राप्त करता है ॥१॥
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BRAHMAMUNI

अत्र सूक्ते इन्द्रशब्देन श्लैषिकत्वेनात्मानं राजानं च ग्राहयति शरीरराष्ट्रयोश्च सम्पोषणसमृद्धिकरणप्रकाराश्च वर्ण्यन्ते।

Word-Meaning: - (विश्वः अन्यः अरिः हि) सर्वोऽन्य ईश्वरः शरीरस्य स्वामिवर्गः प्राणवर्गः “ईश्वरोऽप्यरिः” [निरु० ५।७] “प्राणाय नमो यस्य सर्वमिदं वशे। यो भूतः सर्वस्येश्वरो……[अथर्व० ११।४।१] यद्वा राष्ट्रस्य शासकवर्गः हा ! आश्चर्यम् “हि विस्मये” [अव्ययार्थनिबन्धनम्] (आजगाम) प्राप्तः (अह खेदः “अहः खेदे” [अव्ययार्थनिबन्धनम्] (मम-इत्) मम एव (श्वशुरः न आजगाम) श्वशुरः पत्युः पिता शु क्षिप्रं सद्यः-प्रापणशील आत्मा प्राणशक्त्याः तन्वा नैव खल्वागतः” यद्वा राजा राजनीत्याः खलु न ह्यागतः प्राप्तः संस्थापितः, इति वसुक्रस्य वसुं वासस्थानमात्मनः करोति यः स वसुक्रः, ‘वसूपपदे कृधातोः कः प्रत्यय औणादिकः’ शरीरे प्राणः, राष्ट्रे राष्ट्रमन्त्री तस्य पत्नी प्राणशक्तिस्तनूर्वा राष्ट्रे राष्ट्रनीतिः (धानाः-जक्षीयात्-उत सोमं पपीयात्) योऽत्र शरीरं राष्ट्रं वा-अन्नभोगान् भुञ्जीत सोमरसपानं च पिबेत् (सु-आशितः पुनः-अस्तं जगायात्) भोगान् सुभुक्तवान् सन् पुनः स्वामृतं गृहं मोक्षं स्वप्रतिष्ठापदं प्राप्नुयात् ॥१॥