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यं ते॑ श्ये॒नश्चारु॑मवृ॒कं प॒दाभ॑रदरु॒णं मा॒नमन्ध॑सः । ए॒ना वयो॒ वि ता॒र्यायु॑र्जी॒वस॑ ए॒ना जा॑गार ब॒न्धुता॑ ॥

English Transliteration

yaṁ te śyenaś cārum avṛkam padābharad aruṇam mānam andhasaḥ | enā vayo vi tāry āyur jīvasa enā jāgāra bandhutā ||

Pad Path

यम् । ते॒ । श्ये॒नः । चारु॑म् । अ॒वृ॒कम् । प॒दा । आ । अभ॑रत् । अ॒रु॒णम् । मा॒नम् । अन्ध॑सः । ए॒ना । वयः॑ । वि । ता॒रि॒ । आयुः॑ । जी॒वसे॑ । ए॒ना । जा॒गा॒र॒ । ब॒न्धुता॑ ॥ १०.१४४.५

Rigveda » Mandal:10» Sukta:144» Mantra:5 | Ashtak:8» Adhyay:8» Varga:2» Mantra:5 | Mandal:10» Anuvak:11» Mantra:5


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BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (अन्धसः) अन्न के (मानम्) निर्माण योग्य अंश (अरुणम्) तेजोरूप (चारुम्) सुन्दर या देह में चरण-धारण करने योग्य (अवृकम्) अच्छेद्य अखण्डनीय जिस वीर्य पदार्थ को (श्येनः) आत्मा (पदा) संयमरूप प्राप्ति के साधन से (आ अभरत्) भलिभाँति धारण करता है (एना) उसके द्वारा (जीवसे) जीवन के लिए (वयः-आयुः) तेज और आयु को (वि तारि) बढ़ाता है, प्राप्त कराता है (एना) इसके द्वारा (बन्धुता जागार) परमात्मा के साथ बन्धुता जागती है ॥५॥
Connotation: - मनुष्य जो अन्न खाता है, उससे शरीर का निर्माण करने योग्य तेज, सुन्दर शरीर धारण करने योग्य न नष्ट करने योग्य वीर्य पदार्थ को जीवात्मा संयम से ब्रह्मचर्यरूप आचरण से धारण करता है, जो आयु को बढ़ाता है, जीवन में तेज देता है, परमात्मा के साथ मित्रता को जागृत करता है ॥५॥
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BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (अन्धसः-मानम्-अरुणम्-चारुम्-अवृकम्) अन्नस्य “अन्धः-अन्ननाम” [निघ० २।७] निर्माणयोग्यमंशं तेजोरूपं सुन्दरमच्छेद्यं यं वीर्यपदार्थम्, (श्येनः पदा-आ अभरत्) शंसनीयगतिक आत्मा संयमरूपेण समन्ताद् धारयति (एना) एनेन-एतेन (वयः-जीवसे-आयुः-वि तारि) जीवनाय तेजः “वयः-तेजः” [ऋ० ५।१९।१ दयानन्दः] आयुश्च विशिष्टं प्राप्नोति (एना बन्धुता-जागार) एतेन परमात्मना सह बन्धुता जागर्ति ॥५॥