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देवी॑: षळुर्वीरु॒रु न॑: कृणोत॒ विश्वे॑ देवास इ॒ह वी॑रयध्वम् । मा हा॑स्महि प्र॒जया॒ मा त॒नूभि॒र्मा र॑धाम द्विष॒ते सो॑म राजन् ॥

English Transliteration

devīḥ ṣaḻ urvīr uru naḥ kṛṇota viśve devāsa iha vīrayadhvam | mā hāsmahi prajayā mā tanūbhir mā radhāma dviṣate soma rājan ||

Pad Path

देवीः॑ । षट् । उ॒र्वीः॒ । उ॒रु । नः॒ । कृ॒णो॒त॒ । विश्वे॑ । दे॒वा॒सः॒ । इ॒ह । वी॒र॒य॒ध्व॒म् । मा । हा॒स्म॒हि॒ । प्र॒ऽजया॑ । मा । त॒नूभिः॑ । मा । र॒धा॒म॒ । द्वि॒ष॒ते । सो॒म॒ । रा॒ज॒न् ॥ १०.१२८.५

Rigveda » Mandal:10» Sukta:128» Mantra:5 | Ashtak:8» Adhyay:7» Varga:15» Mantra:5 | Mandal:10» Anuvak:10» Mantra:5


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BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (षट्) छः वसन्त आदि ऋतुएँ या छः पृथिवी, जल, अग्नि, वायु, दिन, रात्रि (उर्वीः) महत्त्ववाली (देवीः) दिव्यगुणवाली वस्तुएँ (नः) हमारे लिये (उरु) बहुत अन्न आदि (कृणोत) करें (विश्वे देवासः) सब विद्वान् विद्युत् मेघ आदि (इह वीरयध्वम्) इस राष्ट्र में बल कार्य करो (प्रजया मा हास्महि) सन्तान से त्यक्त रहित हम न होवें (तनूभिः) अङ्गों से रहित न हों (सोम-राजन्) हे उत्पादक सर्वत्र राजमान परमात्मन् ! (द्विषते मा रधाम) हम द्वेष करनेवाले शत्रु के वश में न होवें ॥५॥
Connotation: - छः वस्तुएँ या पृथिवी जल अग्नि वायु दिन रात बहुत अन्नादिसम्पन्न करनेवाले हों, ऐसा प्रयत्न राष्ट्र के विद्वान् जन करते हैं, मेघादि भी अनुकूल वर्षा कर ऐसा उपचार करते रहें, सन्तान से अपने अङ्गों से फलते-फूलते रहें, शत्रु के वश में भी कभी न आवें, यह यत्न करना चाहिये ॥५॥
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BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (षट्-उर्वी-देवीः) हे षट्सङ्ख्याकाः महत्यो देव्यर्ऋतुरूपाः यद्वा अग्निः पृथिवी आपो वातोहश्च रात्रिः “षण्मोर्वीरंहसस्पान्तु-अग्निश्च पृथिवी चापश्च वाजश्चाहोरात्रिश्च” [श० १।५।१।२२] (नः-उरु कृणोत अस्मभ्यं बहु खल्वन्नादिकं कुरुत (विश्वे देवासः) सर्वे देवा विद्वांसस्तथा मध्यस्थाना विद्युन्मेघादयश्च (इह वीरयध्वम्) अस्मिन् राष्ट्रे बलकार्यं कुरुत (प्रजया मा हास्महि) सन्तत्या पुत्रादिकया न त्यक्ता भवेम “ओहाक् त्यागे” [जुहो०] (तनूभिः-मा) स्वाङ्गैर्न रहिता भवेम (सोम राजन्) के उत्पादक सर्वत्र राजमान परमात्मन् ! (द्विषते मा रधाम) द्वेष्टुः शत्रोः, “षष्ठ्यर्थे चतुर्थी छान्दसी” न वशं गच्छेम “रध्यतिर्वशगमने” [निरु० ६।३२] ॥५॥