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अ॒ग्निर्ह॒ नाम॑ धायि॒ दन्न॒पस्त॑म॒: सं यो वना॑ यु॒वते॒ भस्म॑ना द॒ता । अ॒भि॒प्र॒मुरा॑ जु॒ह्वा॑ स्वध्व॒र इ॒नो न प्रोथ॑मानो॒ यव॑से॒ वृषा॑ ॥

English Transliteration

agnir ha nāma dhāyi dann apastamaḥ saṁ yo vanā yuvate bhasmanā datā | abhipramurā juhvā svadhvara ino na prothamāno yavase vṛṣā ||

Pad Path

अ॒ग्निः । ह॒ । नाम॑ । धा॒यि॒ । दन् । अ॒पःऽत॑मः । सम् । यः । वना॑ । यु॒वते॑ । भस्म॑ना । द॒ता । अ॒भि॒ऽप्र॒मुरा॑ । जु॒ह्वा॑ । सु॒ऽअ॒ध्व॒रः । इ॒नः । न । प्रोथ॑मानः । यव॑से । वृषा॑ ॥ १०.११५.२

Rigveda » Mandal:10» Sukta:115» Mantra:2 | Ashtak:8» Adhyay:6» Varga:18» Mantra:2 | Mandal:10» Anuvak:10» Mantra:2


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BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (दन्) उपासकों के लिये सुख देता हुआ (अपस्तमः) अत्यन्त प्रशस्त कर्मवाला (अग्निः) ज्ञानप्रकाशक अग्रणेता परमात्मा (नाम ह) हाँ अवश्य (धायि) उपासकों द्वारा धारण किया जाता है (यः) जो (दता) दाँत दिखाते हुए हँसने जैसे (भस्मना) स्निग्ध तेज से (वना) सम्भजनीय सुखों का (सं युवते) सम्यक् जोड़ता है (स्वध्वरे) शोभन अध्यात्मयज्ञ में (अभि प्रमुरा) सामनेवाली लपेटने की (जुह्वा) वाणी से (न-इनः) सम्प्रति ईश्वर (प्रोथमानः) व्यापक होता हुआ (यवसे वृषा) अन्न उत्पत्ति के लिये मेघ के समान सुख वृष्टिकारक होता है ॥२॥
Connotation: - अग्रणायक प्रशस्त कर्मवाला परमात्मा उपासकों को सुख देता है, वह अपनी तेजस्विता से शोभन अध्यात्मयज्ञ में स्तुतिवाणी को लक्ष्य कर वह व्यापक स्वामी अन्नोत्पत्ति के लिये जैसे मेघवर्षा करता है, ऐसे आध्यात्मिक अन्न की वृष्टि करता है ॥२॥
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BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (दन्-अपस्तमः-अग्निः-धायि) उपासकेभ्यः सुखं प्रयच्छन् ‘ददातीति दन्’ दा धातोः शतरि छन्दस्युभयार्थेत्यार्धधातुकत्वादाकारलोपः प्रशस्तकर्मवत्तमः “अपस् कर्मनाम” [निघ० २।१] अपसः शब्दाच्छान्दसो मतुब्लोपः, ततस्तमप् प्रत्ययोऽतिशयार्थे, अग्निर्ज्ञानप्रकाशकोऽग्रणेता परमात्मा (ह) पदपूरणः (नाम) वाक्यालङ्कारे-उपासकैर्धीयते धार्यते (यः-दता भस्मना वना सं युवते) दन्तेनेव दन्तप्रदर्शनवता हसननेव भाससा स्निग्धतेजसा सम्मजनीयानि “वन वनन्ति सम्भजन्ति सुखानि यैस्तानि [ऋ० ३।५।१।५ दयानन्दः] सम्मिश्रयति संयोजयति “अन्तर्गतो णिजर्थः” (स्वध्वरे) शोभनाध्यात्मयज्ञे (अभिप्रमुरा जुह्वा) अभि-संवेष्टिकया वाचा “मुर संवेष्टनेन वाचा “वागजुहुः” [तै० आ० २।१७।२] (इनः-न प्रोथमानः) सम्प्रति-ईश्वरो-व्यापकः सन् व्याप्नुवन् (यवसे वृषा) अन्नोत्पत्तये मेघ इव सुखवृष्टिकारकं भवति ॥२॥