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श॒तमिन्नु श॒रदो॒ अन्ति॑ देवा॒ यत्रा॑ नश्च॒क्रा ज॒रसं॑ त॒नूना॑म्। पु॒त्रासो॒ यत्र॑ पि॒तरो॒ भव॑न्ति॒ मा नो॑ म॒ध्या री॑रिष॒तायु॒र्गन्तोः॑ ॥

English Transliteration

śatam in nu śarado anti devā yatrā naś cakrā jarasaṁ tanūnām | putrāso yatra pitaro bhavanti mā no madhyā rīriṣatāyur gantoḥ ||

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Pad Path

श॒तम्। इत्। नु। श॒रदः॑। अन्ति॑। दे॒वाः॒। यत्र॑। नः॒। च॒क्र। ज॒रस॑म्। त॒नूना॑म्। पु॒त्रासः॑। यत्र॑। पि॒तरः॑। भव॑न्ति। मा। नः॒। म॒ध्या। रि॒रि॒ष॒त॒। आयुः॑। गन्तोः॑ ॥

Rigveda » Mandal:1» Sukta:89» Mantra:9 | Ashtak:1» Adhyay:6» Varga:16» Mantra:4 | Mandal:1» Anuvak:14» Mantra:9


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SWAMI DAYANAND SARSWATI

फिर विद्वान् लोग विद्यार्थियों के साथ कैसे वर्त्तें, यह उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥

Word-Meaning: - हे (अन्ति) विद्या आदि सुख साधनों से जीनेवाले (देवाः) विद्वानो ! तुम (यत्र) जिस सत्य व्यवहार में (तनूनाम्) अपने शरीरों के (शतम्) सौ (शरदः) वर्ष (जरसम्) वृद्धपन का (चक्र) व्यतीत कर सको (यत्र) जहाँ (नः) हमारे (मध्या) मध्य में (पुत्रासः) पुत्र लोग (इत्) ही (पितरः) अवस्था और विद्या से युक्त वृद्ध (नु) शीघ्र (भवन्ति) होते हैं, उस (आयुः) जीवन को (गन्तोः) प्राप्त होने को प्रवृत्त हुए (नः) हम लोगों को शीघ्र (मा रीरिषत) नष्ट मत कीजिये ॥ ९ ॥
Connotation: - जिस विद्या में बालक भी वृद्ध होते वा जिस शुभ आचरण में वृद्धावस्था होती है, वह सब व्यवहार विद्वानों के संग ही से हो सकता है और विद्वानों को चाहिये कि यह उक्त व्यवहार सबको प्राप्त करावें ॥ ९ ॥
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SWAMI DAYANAND SARSWATI

पुनर्विद्वांसो विद्यार्थिनः प्रति कथं वर्त्तेरन्नित्युपदिश्यते ॥

Anvay:

हे अन्ति देवा ! यूयं यत्र तनूनां शतं शरदो जरसं चक्र यत्राऽस्माकं नो मध्या मध्ये पुत्रास इत्पितरो नु भवन्ति, तदायुर्गन्तोर्गन्तुं प्रवृत्तान्नोऽस्मान्नु मा रिरीषत ॥ ९ ॥

Word-Meaning: - (शतम्) शतवर्षसंख्याकान् (इत्) एव (नु) शीघ्रम् (शरदः) शरदृतूपलक्षितान् संवत्सरान् (अन्ति) अनन्ति जीवन्ति विद्यादिसुखसाधनैर्ये तेऽन्तयः। अत्रानधातोरौणादिकस्तिन् प्रत्ययः। सुपां सुलुगिति जसो लुक् च। (देवाः) विद्वांसः (यत्र) यस्मिन् सत्ये व्यवहारे। अत्र ऋचि तुनुघेति दीर्घः। (नः) अस्माकम् (चक्र) कुरुत। लोडर्थे लिट्। द्व्यचोऽतस्तिङ इति दीर्घः। (जरसम्) जरां वृद्धावस्थाम्। जराया जरसन्यतरस्याम्। (अष्टा०७.२.१०१) अनेन जराशब्दस्य जरसादेशः। (तनूनाम्) शरीराणाम् (पुत्रासः) (यत्र) (पितरः) वयोविद्यावृद्धाः (भवन्ति) (मा) निषेधे (नः) अस्माकम् (मध्या) मध्ये। अत्र सुपां सुलुगिति सप्तम्याः स्थाने डादेशः। (रीरिषत) हिंस्त (आयुः) जीवनम् (गन्तोः) गन्तुम् प्राप्तुम् ॥ ९ ॥
Connotation: - यस्यां प्राप्तायां विद्यायां बालका अपि वृद्धा भवन्ति, यत्र शुभाचरणेन वृद्धावस्था जायते, तत्सर्वं विदुषां सङ्गेनैव भवितुं शक्यते। विद्वद्भिरेतत्सर्वेभ्यः प्रापयितव्यं च ॥ ९ ॥
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MATA SAVITA JOSHI

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Connotation: - ज्या विद्येमुळे बालकही वृद्ध (अनुभवी) होते व ज्या शुभ आचरणाने वृद्धावस्था प्राप्त होते तो सर्व व्यवहार विद्वानांच्या संगतीनेच होऊ शकतो. हा वरील व्यवहार विद्वानांनी सर्वांना प्राप्त करून द्यावा. ॥ ९ ॥