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स नो॑ वृषन्न॒मुं च॒रुं सत्रा॑दाव॒न्नपा॑वृधि। अ॒स्मभ्य॒मप्र॑तिष्कुतः॥

English Transliteration

sa no vṛṣann amuṁ caruṁ satrādāvann apā vṛdhi | asmabhyam apratiṣkutaḥ ||

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Pad Path

सः। नः॒। वृ॒ष॒न् अ॒मुम्। च॒रुम्। सत्रा॑ऽदावन्। अप॑। वृ॒धि॒। अ॒स्मभ्य॑म्। अप्र॑तिऽस्कुतः॥

Rigveda » Mandal:1» Sukta:7» Mantra:6 | Ashtak:1» Adhyay:1» Varga:14» Mantra:1 | Mandal:1» Anuvak:2» Mantra:6


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SWAMI DAYANAND SARSWATI

मनुष्यों को परमेश्वर की प्रार्थना किस प्रयोजन के लिये करनी चाहिये, वा सूर्य्य किसका निमित्त है, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है-

Word-Meaning: - हे (वृषन्) सुखों के वर्षाने और (सत्रादावन्) सत्यज्ञान को देनेवाले परमेश्वर ! (सः) आप (अस्मभ्यम्) जो कि हम लोग आपकी आज्ञा वा अपने पुरुषार्थ में वर्त्तमान हैं, उनके लिये (अप्रतिष्कुतः) निश्चय करानेहारे (नः) हमारे (अमुम्) उस आनन्द करनेहारे (चरुम्) प्रत्यक्ष मोक्ष के द्वार को ज्ञानलाभ को (अपावृधि) खोल दीजिये। हे परमेश्वर ! जो यह आपका बनाया हुआ (वृषन्) जल को वर्षाने और (सत्रादावन्) उत्तम-उत्तम पदार्थों को प्राप्त करनेवाला (अप्रतिष्कुतः) अपनी कक्षा ही में स्थिर रहता हुआ सूर्य्य (अस्मभ्यम्) हम लोगों के लिये (अमुम्) आकाश में रहनेवाले इस (चरुम्) मेघ को (अपावृधि) भूमि में गिरा देता है ॥६॥
Connotation: - जो मनुष्य अपनी दृढ़ता से सत्यविद्या का अनुष्ठान और नियम से ईश्वर की आज्ञा का पालन करता है, उसके आत्मा में से अविद्यारूपी अन्धकार का नाश अन्तर्य्यामी परमेश्वर कर देता है, जिससे वह पुरुष धर्म और पुरुषार्थ को कभी नहीं छोड़ता ॥६॥
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SWAMI DAYANAND SARSWATI

मनुष्यैः स ईश्वरः किमर्थः प्रार्थनीयः सूर्य्यश्च किंनिमित्त इत्युपदिश्यते।

Anvay:

हे वृषन् सत्रादावन् परमेश्वर ! स त्वमस्मभ्यमप्रतिष्कुतः सन्नोऽस्माकममुं चरुं मोक्षद्वारमपावृधि उद्घाटय इत्याद्यः। तथा भवद्रचितोऽयं सत्रादावा वृषाऽप्रतिष्कुतः सूर्य्योऽस्मभ्यममुं चरुं मेघमपावृणोत्युद्- घाटयतीत्यपरः ॥६॥

Word-Meaning: - (सः) ईश्वरः सूर्य्यो वा (नः) अस्माकम् (वृषन्) वर्षति सुखानि तत्सम्बुद्धौ, वर्षयति जलं वा स वा। कनिन्युवृषि० (उणा०१.१५४) अनेन ‘वृष’ धातोः कनिन्प्रत्ययः। (अमुम्) मोक्षद्वारमागाम्यानन्दं चान्तरिक्षस्थम् (चरुम्) ज्ञानलाभं मेघं वा। चरुरिति मेघनामसु पठितम्। (निघं०१.१०) (सत्रादावन्) सत्यं ददातीति तत्सम्बुद्धौ, सत्रं वृष्ट्याख्यं यज्ञं समन्ताद्ददातीति स वा। सत्रेति सत्यनामसु पठितम्। (निघं०३.१०) अत्र आतो मनिन्क्वनिब्वनिपश्च। (अष्टा०३.२.७२) अनेन वनिप्प्रत्ययः। (अप) निवारणे। निपातस्य च। (अष्टा०६.३.१३६) इति दीर्घः। (वृधि) उद्घाटयोद्घाटयति वा। ‘वृञ्’ धातोः प्रयोगः। बहुलं छन्दसि (अष्टा०२.४.७३) अनेन श्नोर्लुक्। श्रुशृणुपृकृवृभ्यश्छन्दसि (अष्टा०६.४.१०२) अनेन हेर्धिः। (अस्मभ्यम्) त्वदाज्ञायां पुरुषार्थे च वर्त्तमानेभ्यः (अप्रतिष्कुतः) असञ्चलितोऽविस्मृतो वा। यास्काचार्य्योऽस्यार्थमेवमाह-अप्रतिष्कुतोऽप्रतिष्कृतोऽप्रतिस्खलितो वेति। (निरु०६.१६) ॥६॥
Connotation: - यो मनुष्यो दृढतया सत्यं विद्यां चेश्वराज्ञामुपतिष्ठति तस्यात्मन्यन्तर्यामीश्वरोऽविद्यान्धकारं नाशयति। यतो नैव स पुरुषार्थाद्धर्माच्च कदाचिद्विचलति ॥६॥
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MATA SAVITA JOSHI

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Connotation: - जो माणूस आपल्या दृढतेमुळे सत्यविद्येचे अनुष्ठान करतो व नियमाने ईश्वराच्या आज्ञेचे पालन करतो, त्याच्या आत्म्यातील अविद्यारूपी अंधकाराचा नाश अंतर्यामी परमेश्वर करतो, त्यामुळे तो पुरुष धर्म व पुरुषार्थ कधी सोडत नाही. ॥ ६ ॥