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दा॒नाय॒ मनः॑ सोमपावन्नस्तु ते॒ऽर्वाञ्चा॒ हरी॑ वन्दनश्रु॒दा कृ॑धि। यमि॑ष्ठासः॒ सार॑थयो॒ य इ॑न्द्र ते॒ न त्वा॒ केता॒ आ द॑भ्नुवन्ति॒ भूर्ण॑यः ॥

English Transliteration

dānāya manaḥ somapāvann astu te rvāñcā harī vandanaśrud ā kṛdhi | yamiṣṭhāsaḥ sārathayo ya indra te na tvā ketā ā dabhnuvanti bhūrṇayaḥ ||

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Pad Path

दा॒नाय॑। मनः॑। सो॒म॒ऽपा॒व॒न्। अ॒स्तु॒। ते॒। अ॒र्वाञ्चा॑। हरी॒ इति॑। व॒न्द॒न॒ऽश्रु॒त्। आ। कृ॒धि॒। यमि॑ष्ठासः। सार॑थयः। ये। इ॒न्द्र॒। ते॒। न। त्वा॒। केताः॑। आ। द॒भ्नु॒व॒न्ति॒। भूर्ण॑यः ॥

Rigveda » Mandal:1» Sukta:55» Mantra:7 | Ashtak:1» Adhyay:4» Varga:20» Mantra:2 | Mandal:1» Anuvak:10» Mantra:7


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SWAMI DAYANAND SARSWATI

फिर वह कैसा हो, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ॥

Word-Meaning: - हे (वन्दनश्रुत्) स्तुति वा भाषण के सुनने-सुनाने और (सोमपावन्) श्रेष्ठ रसों के पीनेवाले (इन्द्र) परमैश्वर्ययुक्त सभाध्यक्ष ! (ते) आपका (मनः) मन (दानाय) पुत्रों को विद्यादि दान के लिये (अस्तु) अच्छे प्रकार होवे, जैसे वायु वा सूर्य्य के (अर्वाञ्चा) वेगादि गुणों को प्राप्त करानेवाली (हरी) धारणाऽकर्षण गुण और जैसे (भूर्णयः) पोषक (यमिष्ठासः) अतिशय करके यमनकर्ता (सारथयः) रथों को चलानेवाले सारथि घोड़े आदि को सुशिक्षा कर नियम में रखते हैं, वैसे तू सब मनुष्यादि को धर्म में चला और सब में (केताः) शास्त्रीय प्रज्ञाओं को (आकृधि) अच्छे प्रकार प्राप्त कीजिये, इस प्रकार करने से (ये) जो तेरे शत्रु हैं वे (ते) तेरे वश में हो जायें, जिससे (त्वा) तुझ को (न दभ्नुवन्ति) दुःखित न कर सकें ॥ ७ ॥
Connotation: - इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे उत्तम सारथि लोग घोड़े को अच्छे प्रकार शिक्षा करके नियम में चलाते हैं और जैसे तिरछा चलनेवाला वायु नियन्ता है, वैसे धार्मिक पढ़ाने और उपदेश करनेहारे विद्वान् लोग सत्य विद्या और सत्य उपदेशों से सबको सत्याचार में निश्चित करें, इन दोनों के विना मनुष्यों को धर्मात्मा करने के वास्ते कोई भी समर्थ नहीं हो सकता ॥ ७ ॥
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SWAMI DAYANAND SARSWATI

पुनः स कथंभूतः स्यादित्युपदिश्यते ॥

Anvay:

हे वन्दनश्रुत्सोमपावन्निन्द्र ! ते तव मनो दानायास्तु समन्ताद्भवतु यथा वायोरर्वाञ्चौ हरी यथा भूर्णयो यमिष्ठासः सारथयस्तथा सर्वान् धर्मे नियच्छ सर्वेषु केता आकृधि एवंकृते ये तव शत्रवः सन्ति, ते तव वशे भवन्तु त्वा न दभ्नुवन्ति ॥ ७ ॥

Word-Meaning: - (दानाय) सुपात्रेभ्यो विद्यादिदानाय (मनः) अन्तःकरणम् (सोमपावन्) यः सोमान् श्रेष्ठान् रसान् पिबति तत्सम्बुद्धौ (अस्तु) भवतु (ते) तव (अर्वाञ्चा) यावर्वागऽञ्चतस्तौ (हरी) हरणशीलौ (वन्दनश्रुत्) येन वायुना वन्दनं स्तवनं भाषणं शृणोति श्रावयति वा तत्सम्बुद्धौ (आ) समन्तात् (कृधि) कुरु (यमिष्ठासः) अतिशयेन नियन्तारः (सारथयः) यानगमयितारः (ये) सुशिक्षिताः (इन्द्र) सभाद्यध्यक्ष (ते) तव (न) निषेधे (त्वा) त्वाम् (केताः) प्रज्ञाः प्रज्ञापनव्यवहारान् (आ) अभितः (दभ्नुवन्ति) हिंसन्ति (भूर्णयः) ये बिभ्रति ते। अत्र घृणिपृश्नि० (उणा०४.५४) अनेनायं निपातितः ॥ ७ ॥
Connotation: - अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। यथा सुसारथयोऽश्वान् संशिक्ष्य नियच्छन्ति यथा तिर्यग्गामी वायुश्च तथाऽऽध्यापकोपदेशका विद्यासूपदेशाभ्यां सर्वान् सत्याचरणे निश्चितान् कुर्वन्तु न ह्येताभ्यां विना मनुष्यान् धार्मिकान् कर्त्तुं शक्नुवन्ति ॥ ७ ॥
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MATA SAVITA JOSHI

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Connotation: - या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. जसा उत्तम सारथी घोड्यांना प्रशिक्षण देऊन नियमात चालवितो व जसा तिरपा चालणारा वायू नियंता असतो तसे धार्मिक गोष्टी शिकविणाऱ्या व उपदेश करणाऱ्या विद्वानांनी सत्य विद्या व उपदेशाने सर्वांना सत्याचरणात स्थित करावे. याशिवाय माणसांना कोणीही धर्मात्मा बनवू शकत नाही. ॥ ७ ॥