Go To Mantra

शिप्रि॑न्वाजानां पते॒ शची॑व॒स्तव॑ दं॒सना॑। आ तू न॑ इन्द्र शंसय॒ गोष्वश्वे॑षु शु॒भ्रिषु॑ स॒हस्रे॑षु तुवीमघ॥

English Transliteration

śiprin vājānām pate śacīvas tava daṁsanā | ā tū na indra śaṁsaya goṣv aśveṣu śubhriṣu sahasreṣu tuvīmagha ||

Mantra Audio
Pad Path

शिप्रि॑न्। वा॒जा॒ना॒म्। प॒ते॒। शची॑ऽवः। तव॑। दं॒सना॑। आ। तु। नः॒। इ॒न्द्र॒। शं॒स॒य॒। गोषु॑। अश्वे॑षु। शु॒भ्रिषु॑। स॒हस्रे॑षु। तु॒वी॒ऽम॒घ॒॥

Rigveda » Mandal:1» Sukta:29» Mantra:2 | Ashtak:1» Adhyay:2» Varga:27» Mantra:2 | Mandal:1» Anuvak:6» Mantra:2


Reads times

SWAMI DAYANAND SARSWATI

फिर वह विभूतियुक्त सभाध्यक्ष कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है॥

Word-Meaning: - हे (शिप्रिन्) प्राप्त होने योग्य प्रशंसनीय ऐहिक पारमार्थिक वा सुखों को देने हारे (शचीवः) बहुविध प्रजा वा कर्मयुक्त (वाजानाम्) बड़े-बड़े युद्धों के (पते) पालन करने और (तुविमघ) अनेक प्रकार के प्रशंसनीय विद्याधन युक्त (इन्द्र) परमैश्वर्य सहित सभाध्यक्ष जो (तव) आपकी (दंसना) वेद विद्यायुक्त वाणी सहित क्रिया है, उससे आप (सहस्रेषु) हजारह (शुभ्रिषु) शोभन विमान आदि रथ वा उनके उत्तम साधन (गोषु) सत्यभाषण और शास्त्र की शिक्षा सहित वाक् आदि इन्द्रियाँ (अश्वेषु) तथा वेग आदि गुणवाले अग्नि आदि पदार्थों से युक्त घोड़े आदि व्यवहारों में (नः) हम लोगों को (आशंसय) अच्छे गुणयुक्त कीजिये॥२॥
Connotation: - मनुष्यों को इस प्रकार जगदीश्वर की प्रार्थना करनी चाहिये कि हे भगवन् ! कृपा करके जैसे न्यायाधीश अत्युत्तम राज्य आदि को प्राप्त कराता है, वैसे हम लोगों को पृथिवी के राज्य सत्य बोलने और शिल्पविद्या आदि व्यवहारों की सिद्धि करने में बुद्धिमान् नित्य कीजिये॥२॥
Reads times

SWAMI DAYANAND SARSWATI

पुनः स ऐश्वर्ययुक्तः कीदृश इत्युपदिश्यते॥

Anvay:

हे शिप्रिन् शचीवो वाजानां पते तुवीमघेन्द्र न्यायाधीश ! या तव दंसनास्ति तया सहस्रेषु शुभ्रिषु गोष्वश्वेषु नोऽस्मानाशंसय प्रकृष्टगुणवतः सम्पादय॥२॥

Word-Meaning: - (शिप्रिन्) शिप्रे प्राप्तुमर्हे प्रशस्ते व्यावहारिकपारमार्थिके सुखे विद्येते यस्य सभापतेस्तत्सम्बुद्धौ। अत्र प्रशंसार्थ इनिः। शिप्रे इति पदनामसु पठितम्॥ (निघं०४.१) (वाजानाम्) संग्रामाणां मध्ये (पते) पालक (शचीवः) शची बहुविधं कर्म बह्वी प्रजा वा विद्यते यस्य तत्सम्बुद्धौ। शचीति प्रजानामसु पठितम्। (निघं०३.९) कर्मनामसु च (निघं०२.१) अत्र छन्दसीरः। (अष्टा०८.२.१५) इति मतुपो मस्य वः। मतुवसो रु० (अष्टा०८.३.१) इति रुत्वं च। (तव) न्यायाधीशस्य (दंसना) दंसयति भाषयत्यनया क्रियया सा। ण्यासश्रन्थो युच्। (अष्टा०३.३.१०) अनेन दंसिभाषार्थ इत्यस्माद्युच् प्रत्ययः। (आ) अभ्यर्थे क्रियायोगे (तु) पुनरर्थे। पूर्ववद्दीर्घः (नः) अस्माँस्त्वदाज्ञायां वर्त्तमानान् विदुषः (इन्द्र) सर्वराज्यैश्वर्यधारक (शंसय) प्रकृष्टगुणवतः कुरु (गोषु) सत्यभाषणशास्त्रशिक्षासहितेषु वागादीन्द्रियेषु। गौरिति वाङ्नामसु पठितम्। (निघं०१.११) (अश्वेषु) वेगादिगुणवत्सु अग्न्यादिषु (शुभ्रिषु) शोभनेषु विमानादियानेषु तत् साधकतमेषु वा (सहस्रेषु) बहुषु (तुविमघ) बहुविधं मघं पूज्यं विद्याधनं यस्य तत्सम्बुद्धौ। मघमिति धननामसु पठितम्। (निघं०२.१०) मघमिति धननामधेयम्। मंहतेर्दानकर्मणः। (निरु०१.७) अन्येषामपि दृश्यत इति दीर्घः॥२॥
Connotation: - मनुष्यैरित्थं जगदीश्वरं प्रार्थनीयः। हे भगवन् ! त्वया कृपया यथा न्यायाधीशत्वमुत्तमं राज्यादिकं च सम्पाद्यते तथास्मान् पृथिवीराज्यवतः सत्यभाषणयुक्तान् ब्रह्मशिल्पविद्यादिसिद्धिकारकान् बुद्धिमतो नित्यं सम्पादयेति॥२॥
Reads times

MATA SAVITA JOSHI

N/A

Word-Meaning: - N/A
Connotation: - माणसांनी जगदीश्वराची प्रार्थना केली पाहिजे, की हे भगवान! जसे न्यायाधीश अत्युत्तम राज्य प्राप्त करवून देतो, कृपा करून तसे पृथ्वीचे राज्य, सत्यवचन व शिल्पव्यवहाराची सिद्धी करण्यासाठी आम्हाला बुद्धिमान कर. ॥ २ ॥