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मि॒त्रं हु॑वे पू॒तद॑क्षं॒ वरु॑णं च रि॒शाद॑सम्। धियं॑ घृ॒ताचीं॒ साध॑न्ता॥

English Transliteration

mitraṁ huve pūtadakṣaṁ varuṇaṁ ca riśādasam | dhiyaṁ ghṛtācīṁ sādhantā ||

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Pad Path

मि॒त्रम्। हु॒वे॒। पू॒तऽद॑क्षम्। वरु॑णम्। च॒। रि॒शाद॑सम्। धिय॑म्। घृ॒ताची॑म्। साध॑न्ता॥

Rigveda » Mandal:1» Sukta:2» Mantra:7 | Ashtak:1» Adhyay:1» Varga:4» Mantra:2 | Mandal:1» Anuvak:1» Mantra:7


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SWAMI DAYANAND SARSWATI

ईश्वर पूर्वोक्त सूर्य्य और वायु को दूसरे नाम से अगले मन्त्र में स्पष्ट करता है-

Word-Meaning: - मैं शिल्पविद्या का चाहनेवाला मनुष्य, जो (घृताचीम्) जलप्राप्त करानेवाली (धियम्) क्रिया वा बुद्धि को (साधन्ता) सिद्ध करनेवाले हैं, उन (पूतदक्षम्) पवित्रबल सब सुखों के देने वा (मित्रम्) ब्रह्माण्ड में रहनेवाले सूर्य्य और शरीर में रहनेवाले प्राण-मित्रो० इस ऋग्वेद के प्रमाण से मित्र शब्द करके सूर्य्य का ग्रहण है-तथा (रिशादसम्) रोग और शत्रुओं के नाश करने वा (वरुणं च) शरीर के बाहर और भीतर रहनेवाला प्राण और अपानरूप वायु को (हुवे) प्राप्त होऊँ अर्थात् बाहर और भीतर के पदार्थ जिस-जिस विद्या के लिये रचे गये हैं, उन सबों को उस-उस के लिये उपयोग करूँ॥७॥
Connotation: - इस मन्त्र में लुप्तोपमालङ्कार है। जैसे समुद्र आदि जलस्थलों से सूर्य्य के आकर्षण से वायु द्वारा जल आकाश में उड़कर वर्षा होने से सब की वृद्धि और रक्षा होती है, वैसे ही प्राण और अपान आदि ही से शरीर की रक्षा और वृद्धि होती है। इसलिये मनुष्यों को प्राण अपान आदि वायु के निमित्त से व्यवहार विद्या की सिद्धि करके सब के साथ उपकार करना उचित है॥७॥
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SWAMI DAYANAND SARSWATI

पुनरेतौ नामान्तरेणोपदिश्यते।

Anvay:

अहं शिल्पविद्यां चिकीर्षुर्मनुष्यो यौ घृताचीं धियं साधन्तौ वर्त्तेते तौ पूतदक्षं मित्रं रिशादसं वरुणं च हुवे॥७॥

Word-Meaning: - (मित्रम्) सर्वव्यवहारसुखहेतुं ब्रह्माण्डस्थं सूर्य्यं शरीरस्थं प्राणं वा। मित्र इति पदनामसु पठितम्। (निघं०५.४) अतः प्राप्त्यर्थः। मि॒त्रो जना॑न्यातयति ब्रुवा॒णो मि॒त्रो दा॑धार पृथि॒वीमु॒त द्याम्। मि॒त्रः कृ॒ष्टीरनि॑मिषा॒भिच॑ष्टे मि॒त्राय॑ ह॒व्यं घृ॒तव॑ज्जुहोत॥ (ऋ०३.५९.१) अत्र मित्रशब्देन सूर्य्यस्य ग्रहणम्। प्राणो वै मित्रोऽपानो वरुणः। (श०ब्रा०८.२.५.६) अत्र मित्रवरुणशब्दाभ्यां प्राणापानयोर्ग्रहणम्। (हुवे) तन्निमित्तां बाह्याभ्यन्तरपदार्थविद्यामादद्याम्। बहुलं छन्दसीति विकरणाभावो व्यत्ययेनात्मनेपदं लिङर्थे लट् च। (पूतदक्षम्) पूतं पवित्रं दक्षं बलं यस्मिन् तम्। दक्ष इति बलनामसु पठितम्। (निघं०२.९) (वरुणं च) बहिःस्थं प्राणं शरीरस्थमपानं वा। (च) (रिशादसम्) रिशा रोगाः शत्रवो वाऽदसो हिंसिता भवन्ति येन तम्। (धियम्) कर्म धारणावतीं बुद्धिं च। धीरिति कर्मनामसु पठितम्। (निघं०२.१), प्रज्ञानामसु च। (निघं०३.९)। (घृताचीम्) घृतं जलमञ्चति प्रापयतीति तां क्रियाम्। घृतमित्युदकनामसु पठितम्। (निघं०१.१२) (साधन्ता) सम्यक् साधयन्तौ। अत्र सुपां सुलुगित्याकारादेशः॥७॥
Connotation: - अत्र लुप्तोपमालङ्कारः। यथा सूर्य्यवायुनिमित्तेन समुद्रादिभ्यो जलमुपरि गत्वा तद्वृष्ट्या सर्वस्य वृद्धिरक्षणे भवतः, एवं प्राणापानाभ्यां च शरीरस्य। अतः सर्वैर्मनुष्यैराभ्यां निमित्तीकृताभ्यां व्यवहारविद्यासिद्धेः सर्वोपकारः सदा निष्पादनीय इति॥७॥
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MATA SAVITA JOSHI

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Connotation: - या मंत्रात लुप्तोपमालंकार आहे. जसे सूर्याच्या आकर्षणामुळे वायू इत्यादीद्वारे समुद्र व जलीय स्थानातून जल आकाशात जाते व पर्जन्यवृष्टी होते आणि सर्वांची वृद्धी व रक्षण होते तसेच शरीरात प्राण अपान इत्यादी वायू शरीराचे रक्षण व वृद्धी करतात. त्यासाठी माणसांनी प्राण-अपान इत्यादी वायूच्या निमित्ताने व्यवहार विद्या सिद्ध करून सर्वांवर उपकार करावे. ॥ ७ ॥