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अश्वा॑वती॒र्गोम॑तीर्वि॒श्ववा॑रा॒ यत॑माना र॒श्मिभि॒: सूर्य॑स्य। परा॑ च॒ यन्ति॒ पुन॒रा च॑ यन्ति भ॒द्रा नाम॒ वह॑माना उ॒षास॑: ॥

English Transliteration

aśvāvatīr gomatīr viśvavārā yatamānā raśmibhiḥ sūryasya | parā ca yanti punar ā ca yanti bhadrā nāma vahamānā uṣāsaḥ ||

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Pad Path

अश्व॑ऽवतीः। गोऽम॑तीः। वि॒श्वऽवा॑राः। यत॑मानाः। र॒श्मिऽभिः॑। सूर्य॑स्य। परा॑। च॒। यन्ति॑। पुनः॑। आ। च॒। य॒न्ति॒। भ॒द्रा। नाम॑। वह॑मानाः। उ॒षसः॑ ॥ १.१२३.१२

Rigveda » Mandal:1» Sukta:123» Mantra:12 | Ashtak:2» Adhyay:1» Varga:6» Mantra:2 | Mandal:1» Anuvak:18» Mantra:12


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SWAMI DAYANAND SARSWATI

फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

Word-Meaning: - हे स्त्रियो ! जैसे (सूर्यस्य) सूर्यमण्डल की (रश्मिभिः) किरणों के साथ उत्पन्न (यतमानाः) उत्तम यत्न करती हुई (अश्वावतीः) जिनकी प्रशंसित व्याप्तियाँ (गोमतीः) जो बहुत पृथिवी आदि लोक और किरणों से युक्त (विश्ववाराः) समस्त जगत् को अपने में लेती और (भद्रा) अच्छे (नाम) नामों को (वहमानाः) सबकी बुद्धियों में पहुँचाती हुई (उषसः) प्रभातवेला नियम के साथ (परा, यन्ति) पीछे को जाती (च) और (पुनः) फिर (च) भी (आ, यन्ति) आती हैं, वैसे नियम से तुम अपना वर्त्ताव वर्तो ॥ १२ ॥
Connotation: - इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे प्रभातवेला सूर्य के संयोग से नियम को प्राप्त हैं, वैसे विवाहित स्त्रीपुरुष परस्पर प्रेम के स्थिर करनेहारे हों ॥ १२ ॥
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SWAMI DAYANAND SARSWATI

पुनस्तमेव विषयमाह ।

Anvay:

हे स्त्रियो सूर्यस्य रश्मिभिस्सहोत्पन्ना यतमाना अश्वावतीर्गोमतीर्विश्ववारा भद्रा नाम वहमाना उषसः परा यन्ति च पुनरायन्ति च तथा यूयं वर्त्तध्वम् ॥ १२ ॥

Word-Meaning: - (अश्वावतीः) प्रशस्ता अश्वा व्याप्तयो विद्यन्ते यासां ताः। अत्र मतौ पूर्वपदस्य दीर्घः। (गोमतीः) बहुपृथिवीकिरणयुक्ताः (विश्ववाराः) याः सर्वं जगद्वृण्वन्ति ताः (यतमानाः) प्रयत्नं कुर्वत्यः (रश्मिभिः) किरणैः सह (सूर्यस्य) सवितृलोकस्य (परा) (च) (यन्ति) गच्छन्ति (पुनः) (आ) (च) (यन्ति) (भद्रा) भद्राणि (नाम) नामानि (वहमानाः) प्राप्नुवत्यः (उषासः) प्रत्यूषसमयाः। अत्रान्येषामपीति दीर्घः ॥ १२ ॥
Connotation: - अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। यथा प्रभातवेलाः सूर्यस्य सन्नियोगेन नियताः सन्ति तथा विवाहिताः स्त्रीपुरुषा परस्परं प्रेमास्पदाः स्युः ॥ १२ ॥
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MATA SAVITA JOSHI

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Connotation: - या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. जशी प्रातः काळची वेळ सूर्याच्या संयोगाने नियमात बांधली जाते. तसे विवाहित स्त्री-पुरुषांनी परस्पर प्रेमात स्थिर असावे. ॥ १२ ॥