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अ॒ना॒र॒म्भ॒णे तद॑वीरयेथामनास्था॒ने अ॑ग्रभ॒णे स॑मु॒द्रे। यद॑श्विना ऊ॒हथु॑र्भु॒ज्युमस्तं॑ श॒तारि॑त्रां॒ नाव॑मातस्थि॒वांस॑म् ॥

English Transliteration

anārambhaṇe tad avīrayethām anāsthāne agrabhaṇe samudre | yad aśvinā ūhathur bhujyum astaṁ śatāritrāṁ nāvam ātasthivāṁsam ||

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Pad Path

अ॒ना॒र॒म्भ॒णे। तत्। अ॒वी॒र॒ये॒था॒म्। अ॒ना॒स्था॒ने। अ॒ग्र॒भ॒णे। स॒मु॒द्रे। यत्। अ॒श्वि॒ना॒। ऊ॒हथुः॑। भु॒ज्युम्। अस्त॑म्। श॒तऽअ॑रित्रान्। नाव॑म्। आ॒त॒स्थि॒वांस॑म् ॥ १.११६.५

Rigveda » Mandal:1» Sukta:116» Mantra:5 | Ashtak:1» Adhyay:8» Varga:8» Mantra:5 | Mandal:1» Anuvak:17» Mantra:5


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SWAMI DAYANAND SARSWATI

फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

Word-Meaning: - हे (अश्विनौ) विद्या में व्याप्त होनेवाले सभा सेनापति ! (यत्) तुम दोनों (अनारम्भणे) जिसमें आने-जाने का आरम्भ (अनास्थाने) ठहरने की जगह और (अग्रभणे) पकड़ नहीं है उस (समुद्रे) अन्तरिक्ष वा सागर में (शतारित्राम्) जिसमें जल की थाह लेने को सौ वल्ली वा सौ खम्भे लगे रहते और (नावम्) जिसको चलाते वा पठाते उस नाव को बिजुली और पवन के वेग के समान (ऊहथुः) बहाओ और (अस्तम्) जिसमें दुःखों को दूर करें उस घर में (आतस्थिवांसम्) धरे हुए (भुज्यम्) खाने-पीने के पदार्थ समूह को (अवीरयेथाम्) एक देश से दूसरे देश को ले जाओ, (तत्) उन तुम लोगों का हम सदा सत्कार करें ॥ ५ ॥
Connotation: - राजपुरुषों को चाहिये कि निरालम्ब मार्ग में अर्थात् जिसमें कुछ ठहरने का स्थान नहीं है वहां विमान आदि यानों से ही जावें। जबतक युद्ध में लड़नेवाले वीरों की जैसी चाहिये वैसी रक्षा न की जाय तबतक शत्रु जीते नहीं जा सकते, जिसमें सौ वल्ली विद्यमान हैं वह बड़े फैलाव की नाव बनाई जा सकती है। इस मन्त्र में शत शब्द असंख्यातयाची भी लिया जा सकता है, इससे अतिदीर्घ नौका का बनाना इस मन्त्र में जाना जाता है। मनुष्य जितनी बड़ी नौका बना सकते हैं, उतनी बड़ी बनानी चाहिये। इस प्रकार शीघ्र जानेवाला पुरुष भूमि और अन्तरिक्ष में जाने-आने के लिये यानों को बनावे ॥ ५ ॥
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SWAMI DAYANAND SARSWATI

पुनस्तमेव विषयमाह ।

Anvay:

हे अश्विनौ यद्यौ युवामनारम्भणेऽनास्थानेऽग्रभणे समुद्रे शतारित्रां नावमूहथुरस्तमातस्थिवांसं भुज्युमवीरयेथां विक्रमेथां तत् वयं सदा सत्कुर्याम ॥ ५ ॥

Word-Meaning: - (अनारम्भणे) अविद्यमानमारम्भणं यस्मिँस्तस्मिन् (तत्) तौ (अवीरयेथाम्) विक्रमेथाम् (अनास्थाने) अविद्यमानं स्थित्यधिकरणं यस्मिन् (अग्रभणे) न विद्यते ग्रहणं यस्मिन्। अत्र हस्यः भः। (समुद्रे) अन्तरिक्षे सागरे वा (यत्) यौ (अश्विनौ) विद्याप्राप्तिशीलौ (ऊहथुः) विद्युद्वायू इव सद्यो गमयेतम् (भुज्युम्) भोगसमूहम् (अस्तम्) अस्यन्ति दूरीकुर्वन्ति दुःखानि यस्मिँस्तद्गृहम्। अस्तमिति गृहना०। निघं० ३। ४। (शतारित्राम्) शतसंख्याकान्यरित्राणि जलपरिमाणग्रहणार्थानि स्तम्भनानि वा यस्याम् (नावम्) नुदन्ति चालयन्ति प्रेरते वा यां ताम्। ग्लानुदिभ्यां डौः। उ० २। ६४। अनेनायं सिद्धः। (आतस्थिवांसम्) आस्थितम् ॥ ५ ॥
Connotation: - राजपुरुषैरालम्बविरहे मार्गे विमानादिभिरेव गन्तव्यं यावद् योद्धारो यथावन्न रक्ष्यन्ते तावच्छत्रवो जेतुं न शक्यन्ते। यत्र शतमरित्राणि विद्यन्ते सा महाविस्तीर्णा नौर्विधातुं शक्यते। अत्र शतशब्दोऽसंख्यातवाच्यपि ग्रहीतुं शक्यते। अतोऽतिदीर्घाया नौकाया विधानमत्र गम्यते। मनुष्यैर्यावती नौर्विधातुं शक्यते तावतीं निर्मातव्यैवं सद्योगामी जनो भूम्यन्तरिक्षगमनागमनार्थान्यपि यानानि विदध्यात् ॥ ५ ॥
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MATA SAVITA JOSHI

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Connotation: - राजपुरुषांनी निरालम्ब मार्गात अर्थात जेथे उतरण्याची जागा नाही तेथे विमान इत्यादी यानांनी जावे. जोपर्यंत युद्धात लढणाऱ्या वीरांचे योग्य रक्षण होत नसेल तोपर्यंत शत्रूंना जिंकता येत नाही. ज्यात शंभर वल्हे असतात अशी मोठी नौका तयार करता येऊ शकते. या मंत्रात शत शब्द असंख्यात या अर्थानेही घेता येऊ शकतो. अति दीर्घ नौका तयार करणे हे या मंत्रावरून जाणता येते. माणसांना जेवढी मोठी नौका बनविता येईल तेवढी बनवावी. याप्रमाणे शीघ्र प्रवास करणाऱ्या पुरुषाने भूमी व अंतरिक्षात गमनागमनासाठी याने बनवावीत. ॥ ५ ॥