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याभि॒: पठ॑र्वा॒ जठ॑रस्य म॒ज्मना॒ग्निर्नादी॑देच्चि॒त इ॒द्धो अज्म॒न्ना। याभि॒: शर्या॑त॒मव॑थो महाध॒ने ताभि॑रू॒ षु ऊ॒तिभि॑रश्वि॒ना ग॑तम् ॥

English Transliteration

yābhiḥ paṭharvā jaṭharasya majmanāgnir nādīdec cita iddho ajmann ā | yābhiḥ śaryātam avatho mahādhane tābhir ū ṣu ūtibhir aśvinā gatam ||

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Pad Path

याभिः॑। पठ॑र्वा। जठ॑रस्य। म॒ज्मना। अ॒ग्निः। न। अदी॑देत्। चि॒तः। इ॒द्धः। अज्म॑न्। आ। याभिः॑। शर्या॑तम्। अव॑थः। म॒हा॒ऽध॒ने। ताभिः॑। ऊँ॒ इति॑। सु। ऊ॒तिऽभिः॑। अ॒श्वि॒ना॒। आ। ग॒त॒म् ॥ १.११२.१७

Rigveda » Mandal:1» Sukta:112» Mantra:17 | Ashtak:1» Adhyay:7» Varga:36» Mantra:2 | Mandal:1» Anuvak:16» Mantra:17


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SWAMI DAYANAND SARSWATI

अब सभापति और सेनापति को कैसा अनुष्ठान करना चाहिये, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

Word-Meaning: - हे (अश्विना) सभा और सेना के अधीश ! तुम दोनों (याभिः) जिन (ऊतिभिः) रक्षाओं से (पठर्वा) पढ़नेवाले विद्यार्थियों को जो प्राप्त होता वा (मज्मना) बल से (जठरस्य) उदर के मध्य (चितः) सञ्चित किये (इद्धः) प्रदीप्त (अग्निः) अग्नि के (न) समान (अज्मन्) जिसमें शत्रुओं को गिराते हैं उस बड़े-बड़े धन की प्राप्ति करानेहारे युद्ध में (आ, अदीदेत्) अच्छे प्रदीप्त होवे, वा (याभिः) जिन रक्षाओं के (शर्य्यातम्) हिंसा करनेहारे को प्राप्त पुरुष की (अवथः) रक्षा करो, (ताभिरु) इन्हीं रक्षाओं से प्रजा सेना की रक्षा के लिये (सु, आ, गतम्) आया-जाया कीजिये ॥ १७ ॥
Connotation: - इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे कोई शौर्य्यादि गुणों से शोभायमान राजा रक्षणीय की रक्षा करे और मारने योग्यों को मारे और जैसे अग्नि वन का दाह करे वैसे शत्रु की सेना को भस्म करे और शत्रुओं के बड़े-बड़े धनों को प्राप्त कराकर आनन्दित करावे, वैसे ही सभा और सेना के प्रति काम किया करें ॥ १७ ॥
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SWAMI DAYANAND SARSWATI

अथ सभासेनापतिभ्यां कथमनुष्ठेयमित्याह ।

Anvay:

हे अश्विना युवां याभिरूतिभिः पठर्वा मज्मना जठरस्य मध्ये चित इद्धोऽग्निर्नेवाज्मन् महाधन आदीदेत्। याभिः शर्य्यातमवथस्ताभिरु प्रजासेनारक्षार्थं स्वागतम् ॥ १७ ॥

Word-Meaning: - (याभिः) (पठर्वा) ये पठन्ति तान् विद्यार्थिन ऋच्छति प्राप्नोति स सेनाध्यक्षः (जठरस्य) उदरस्य मध्ये। जठरमुदरं भवति जग्धमस्मिन् धीयते (वा)। निरु० ४। ७। (मज्मना) बलेन (अग्निः) पावकः (न) इव (अदीदेत्) प्रदीप्येत। दीदयतीति ज्वलतिकर्मसु पठितम्। निघं० १। १६। अत्र दीदिधातोर्लङि प्रथमैकवचने शपो लुक्। (चितः) इन्धनैः संयुक्तः (इद्धः) प्रदीप्तः (अज्मन्) अजन्ति प्रक्षिपन्ति शत्रून् यस्मिंस्तत्र (आ) (याभिः) (शर्य्यातम्) शरो हिंसकान् प्राप्तम् (अवथः) रक्षथः (महाधने) महान्ति धनानि यस्मात् तस्मिँस्ताभिरिति पूर्ववत् ॥ १७ ॥
Connotation: - अत्रोपमालङ्कारः। यथा कश्चित् शौर्य्यादिगुणैः शुम्भमानो राजा रक्ष्यान् रक्षेत् घात्यान् हन्यादग्निर्वनमिव शत्रुसेना दहेत् शत्रूणां महान्ति धनानि प्रापय्यानन्दयेत्। तथैव सभासेनापतिभ्यामनुष्ठेयम् ॥ १७ ॥
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MATA SAVITA JOSHI

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Connotation: - या मंत्रात उपमालंकार आहे. जसा एखादा शूर राजा रक्षणीयांचे रक्षण करतो व हनन करण्यायोग्य माणसांचे हनन करतो. जसा अग्नी वनाचा दाह करतो तसे शत्रूच्या सेनेला भस्म करतो. शत्रूंपासून पुष्कळ धन प्राप्त करतो व आनंदी करवितो तसेच सभा व सेनापतीने काम करावे. ॥ १७ ॥