Go To Mantra

त आ॑दित्या॒ आ ग॑ता स॒र्वता॑तये भू॒त दे॑वा वृत्र॒तूर्ये॑षु श॒म्भुव॑:। रथं॒ न दु॒र्गाद्व॑सवः सुदानवो॒ विश्व॑स्मान्नो॒ अंह॑सो॒ निष्पि॑पर्तन ॥

English Transliteration

ta ādityā ā gatā sarvatātaye bhūta devā vṛtratūryeṣu śambhuvaḥ | rathaṁ na durgād vasavaḥ sudānavo viśvasmān no aṁhaso niṣ pipartana ||

Mantra Audio
Pad Path

ते। आ॒दि॒त्याः॒। आ। ग॒त॒। स॒र्वऽता॑तये। भू॒त। दे॒वाः॒। वृ॒त्र॒ऽतूर्ये॑षु। श॒म्ऽभुवः॑। रथ॑म्। न। दुः॒ऽगात्। व॒स॒वः॒। सु॒ऽदा॒नवः॒। विश्व॑स्मात्। नः॒। अंह॑सः। निः। पि॒प॒र्त॒न॒ ॥ १.१०६.२

Rigveda » Mandal:1» Sukta:106» Mantra:2 | Ashtak:1» Adhyay:7» Varga:24» Mantra:2 | Mandal:1» Anuvak:16» Mantra:2


Reads times

SWAMI DAYANAND SARSWATI

फिर वे कैसे हैं, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ।

Word-Meaning: - हे (देवाः) दिव्यगुणवाले विद्वान् जनो ! जैसे (आदित्याः) कारणरूप से नित्य दिव्यगुणवाले जो सूर्य्य आदि पदार्थ हैं (ते) वे (वृत्रतूर्य्येषु) मेघावयवों अर्थात् बद्दलों का हिंसन विनाश करना जिनमें होता है, उन संग्रामों में (शंभुवः) सुख की भावना करानेवाले होते हैं, वैसे ही आप लोग हमारे समीप को (आ, गत) आओ और आकर शत्रुओं का हिंसन जिनमें हो, उन संग्रामों में (सर्वतातये) समस्त सुख के लिये (शंभुवः) सुख की भावना करानेवाले (भूत) होओ। शेष मन्त्रार्थ प्रथम मन्त्र के समान जानना चाहिये ॥ २ ॥
Connotation: - इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे ईश्वर के बनाये हुए पृथिवी आदि पदार्थ सब प्राणियों के उपकार के लिये हैं, वैसे ही सबके उपकार के लिये विद्वानों को नित्य अपना वर्त्ताव रखना चाहिये। जैसे अच्छे दृढ़ विमान आदि यान पर बैठ देश-देशान्तर की जा-आकर व्यापार वा विजय से धन और प्रतिष्ठा को प्राप्त हो दरिद्रता और अयश से छूटकर सुखी होते हैं, वैसे ही विद्वान् जन अपने उपदेश से विद्या को प्राप्त कराकर सबको सुखी करें ॥ २ ॥
Reads times

SWAMI DAYANAND SARSWATI

पुनस्ते कीदृशा इत्युपदिश्यते ।

Anvay:

हे देवा विद्वांसो यथा ये आदित्या देवाः सूर्यादयः पदार्थास्ते वृत्रतूर्येषु शंभुवो भवन्ति तथैव यूयमस्माकं सनीडमागतागत्य वृत्रतूर्येषु सर्वतातये शंभुवो भूत। अन्यत् पूर्ववत् ॥ २ ॥

Word-Meaning: - (ते) (आदित्याः) कारणरूपेण नित्याः सूर्यादयः पदार्थाः (आ) क्रियायोगे (गत) गच्छत। अत्र द्व्यचोऽतस्तिङ इति दीर्घः। (सर्वतातये) सर्वस्मै सुखाय (भूत) भवत। अत्र गत भूतेत्युभयत्र लोटि मध्यमबहुवचने बहुलं छन्दसीति शपो लुक्। (देवाः) दिव्यगुणवन्तस्तत्संबुद्धौ दिव्यगुणा वा (वृत्रतूर्येषु) वृत्राणां शत्रूणां मेघावयवानां वा तूर्येषु हिंसनकर्मसु संग्रामेषु (शंभुवः) ये शं सुखं भावयन्ति ते। रथं, न, दुर्गादिति पूर्ववत् ॥ २ ॥
Connotation: - अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। यथेश्वरेण सृष्टाः पृथिव्यादयः पदार्थाः सर्वेषां प्राणिनामुपकाराय वर्तन्ते तथैव सर्वेषामुपकाराय विद्वद्भिर्नित्यं वर्त्तितव्यम्। यथा सुदृढस्य यानस्योपरि स्थित्वा देशान्तरं गत्वा व्यापारेण विजयेन वा धनप्रतिष्ठे प्राप्य दारिद्र्याप्रतिष्ठाभ्यां विमुच्य सुखिनो भवन्ति तथैव विद्वांस उपदेशेन विद्यां प्रापय्य सर्वान् सुखिनः संपादयन्तु ॥ २ ॥
Reads times

MATA SAVITA JOSHI

N/A

Word-Meaning: - N/A
Connotation: - या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. जसे ईश्वराने निर्माण केलेले पृथ्वी इत्यादी पदार्थ सर्व प्राण्यांवर उपकार करण्यासाठी असतात. तसेच सर्वांच्या उपकारासाठी विद्वानांनी वागावे. जसे व्यवस्थित असलेल्या विमान इत्यादी यानात बसून देशदेशांतरी जाऊन येऊन व्यापार, विजय, धन व प्रतिष्ठा प्राप्त करून दारिद्र्य व अपयश दूर होते आणि सुखी होता येते. तसेच विद्वान लोकांनी आपल्या उपदेशाने विद्या प्राप्त करून सर्वांना सुखी करावे. ॥ २ ॥