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स जा॒मिभि॒र्यत्स॒मजा॑ति मी॒ळ्हेऽजा॑मिभिर्वा पुरुहू॒त एवै॑:। अ॒पां तो॒कस्य॒ तन॑यस्य जे॒षे म॒रुत्वा॑न्नो भव॒त्विन्द्र॑ ऊ॒ती ॥

English Transliteration

sa jāmibhir yat samajāti mīḻhe jāmibhir vā puruhūta evaiḥ | apāṁ tokasya tanayasya jeṣe marutvān no bhavatv indra ūtī ||

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Pad Path

सः। जा॒मिऽभिः॑। यत्। स॒म्ऽअजा॑ति। मी॒ळ्हे। अजा॑मिऽभिः। वा॒। पु॒रु॒ऽहू॒तः। एवैः॑। अ॒पाम्। तो॒कस्य॑। तन॑यस्य। जे॒षे। म॒रुत्वा॑न्। नः॒। भ॒व॒तु॒। इन्द्रः॑। ऊ॒ती ॥ १.१००.११

Rigveda » Mandal:1» Sukta:100» Mantra:11 | Ashtak:1» Adhyay:7» Varga:10» Mantra:1 | Mandal:1» Anuvak:15» Mantra:11


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SWAMI DAYANAND SARSWATI

फिर वह कैसा है, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

Word-Meaning: - जो (अपाम्) प्राप्त हुए मित्र, शत्रु और उदासीनों वा (तोकस्य) बालकों के वा (तनयस्य) पौत्र आदि बीच वर्त्ताव रखता हुआ (यत्) जब (मीह्ळे) संग्रामों में (एवैः) प्राप्त हुए (जामिभिः) शत्रुजनों के सहित (अजामिभिः) बन्धुवर्गों से अन्य शत्रुओं के सहित (वा) अथवा उदासीन मनुष्यों के साथ विरोधभाव प्रकट करता हुआ (पुरुहूतः) बहुतों से प्रशंसा को प्राप्त वा युद्ध में बुलाया हुआ (मरुत्वान्) अपनी सेना में उत्तम वीरों को रखनेवाला (इन्द्रः) परमैश्वर्य्यवान् सेना आदि का अधीश (जेषे) उक्त अपने बन्धु भाइयों को उत्साह और उत्कर्ष देने वा शत्रुओं के जीत लेने का (समजाति) अच्छा ढङ्ग जानता है (सः) वह (नः) हम लोगों के (ऊती) रक्षा आदि व्यवहार के लिये समर्थ (भवतु) हो ॥ ११ ॥
Connotation: - इस राज्यव्यवहार में किसी गृहस्थ को छोड़ ब्रह्मचारी वनस्थ वा यति की प्रवृत्ति होने योग्य नहीं है, और न कोई अच्छे मित्र और बन्धुओं के विना युद्ध में शत्रुओं को परास्त कर सकता है, ऐसे धार्मिक विद्वानों के विना कोई सेना आदि का अधिपति होने योग्य नहीं है, यह जानना चाहिये ॥ ११ ॥
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SWAMI DAYANAND SARSWATI

पुनः स कीदृश इत्युपदिश्यते ।

Anvay:

योऽपान्तोकस्य तनयस्य च मध्ये वर्त्तमानः सन् यन्मीह्ळ एवैर्जामिभिः सहित एवैरजामिभिः शत्रुभिर्वोदासीनैः सह विरुद्ध्यन् पुरुहूतो मरुत्वानिन्द्रः सेनाद्यधिपतिर्जेष एतान् स्वीयानुत्कर्ष्टुं शत्रून् विजेतुं वा समजाति तदा स न ऊती समर्थो भवतु ॥ ११ ॥

Word-Meaning: - (सः) (जामिभिः) बन्धुवर्गैः सह (यत्) यदा (समजाति) संजानीयात् (मीहळे) संग्रामे। मीह्ळे इति संग्रामनामसु पठितम्। निघं० २। १७। (अजामिभिः) अबन्धुवर्गैः शत्रुभिः (वा) उदासीनैः (पुरुहूतः) बहुभिः स्तुतो युद्ध आहूतो (एवैः) प्राप्तैः (अपाम्) प्राप्तानां मित्रशत्रूदासीनानां पुरुषाणां (मध्ये) (तोकस्य) अपत्यस्य (तनयस्य) पौत्रादेः (जेषे) उत्कर्ष्टुं विजेतुम्। अत्र जिधातोस्तुमर्थे से प्रत्ययः। सायणाचार्य्येणेदमपि पदमशुद्धं व्याख्यातमर्थगत्यासंभवात् (मरुत्वान्नः) इति पूर्ववत् ॥ ११ ॥
Connotation: - नह्यत्र राज्यव्यवहारे केनचिद् गृहस्थेन विना ब्रह्मचारिणो वनस्थस्य यतेर्वा प्रवृत्तेर्योग्यतास्ति, न कश्चित्सुमित्रैर्बन्धुवर्गैर्विना युद्धे शत्रून् पराजेतुं शक्नोति, न खल्वेवंभूतेन धार्मिकेण विना कश्चित्सेनाद्यधिपतित्वमर्हतीति वेदितव्यम् ॥ ११ ॥
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MATA SAVITA JOSHI

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Connotation: - राज्यव्यवहारात एखाद्या दुसऱ्या गृहस्थाशिवाय ब्रह्मचारी, वानप्रस्थी व यती होण्याची प्रवृत्ती असणे योग्य नाही. चांगले मित्र, बंधू असल्याशिवाय युद्धात किंवा शत्रूंना कोणी परास्त करू शकत नाही. अशा धार्मिक विद्वानांशिवाय कोणी सेनेचा अधिपती बनू शकत नाही, हे जाणले पाहिजे. ॥ ११ ॥