Go To Mantra

उ॒क्थमिन्द्रा॑य॒ शंस्यं॒ वर्ध॑नं पुरुनि॒ष्षिधे॑। श॒क्रो यथा॑ सु॒तेषु॑ णो रा॒रण॑त्स॒ख्येषु॑ च॥

English Transliteration

uktham indrāya śaṁsyaṁ vardhanam puruniṣṣidhe | śakro yathā suteṣu ṇo rāraṇat sakhyeṣu ca ||

Mantra Audio
Pad Path

उ॒क्थम्। इन्द्रा॑य। शंस्य॑म्। वर्ध॑नम्। पु॒रु॒निः॒ऽसिधे॑। श॒क्रः। यथा॑। सु॒तेषु॑। नः॒। रा॒रण॑त्। स॒ख्येषु॑। च॒॥

Rigveda » Mandal:1» Sukta:10» Mantra:5 | Ashtak:1» Adhyay:1» Varga:19» Mantra:5 | Mandal:1» Anuvak:3» Mantra:5


Reads times

SWAMI DAYANAND SARSWATI

फिर भी ईश्वर किस प्रकार का है, इस विषय का अगले मन्त्र में प्रकाश किया है-

Word-Meaning: - (यथा) जैसे कोई मनुष्य अपने (सुतेषु) सन्तानों और (सख्येषु) मित्रों के उपकार करने को प्रवृत्त होके सुखी होता है, वैसे ही (शक्रः) सर्वशक्तिमान् जगदीश्वर (पुरुनिष्षिधे) पुष्कल शास्त्रों को पढ़ने-पढ़ाने और धर्मयुक्त कामों में विचरनेवाले (इन्द्राय) सब के मित्र और ऐश्वर्य की इच्छा करनेवाले धार्मिक जीव के लिये (वर्धनम्) विद्या आदि गुणों के बढ़ानेवाले (शंस्यम्) प्रशंसा (च) और (उक्थम्) उपदेश करने योग्य वेदोक्त स्तोत्रों के अर्थों का (रारणत्) अच्छी प्रकार उपदेश करता है॥५॥
Connotation: - इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। इस संसार में जो-जो शोभायुक्त रचना प्रशंसा और धन्यवाद हैं, वे सब परमेश्वर ही की अनन्त शक्ति का प्रकाश करते हैं, क्योंकि जैसे सिद्ध किये हुए पदार्थों में प्रशंसायुक्त रचना के अनेक गुण उन पदार्थों के रचनेवाले की ही प्रशंसा के हेतु हैं, वैसे ही परमेश्वर की प्रशंसा जनाने वा प्रार्थना के लिये हैं। इस कारण जो-जो पदार्थ हम ईश्वर से प्रार्थना के साथ चाहते हैं, सो-सो हमारे अत्यन्त पुरुषार्थ के द्वारा ही प्राप्त होने योग्य हैं, केवल प्रार्थनामात्र से नहीं॥५॥
Reads times

SWAMI DAYANAND SARSWATI

पुनः स कीदृशोऽस्तीत्युपदिश्यते।

Anvay:

यथा कश्चिन्मनुष्यः सुतेषु सख्येषु चोपकारी वर्त्तते तथैव शक्रः सर्वशक्तिमान् जगदीश्वरः कृपायमाणः सन् पुरुनिष्षिध इन्द्राय जीवाय वर्धनं शंस्यमुक्थं च रारणत् यथावदुपदिशति॥५॥

Word-Meaning: - (उक्थम्) वक्तुं योग्यं स्तोत्रम्। अत्र पातॄतुदि० (उणा०२.७) अनेन ‘वच’ धातोः थक् प्रत्ययः। (इन्द्राय) सर्वमित्रायैश्वर्य्यमिच्छुकाय जीवाय (शंस्यम्) शंसितुं योग्यम् (वर्धनम्) विद्यादिगुणानां वर्धकम् (पुरुनिष्षिधे) पुरूणि बहूनि शास्त्राणि मङ्गलानि च नितरां सेधतीति तस्मै (शक्रः) समर्थः शक्तिमान् (यथा) येन प्रकारेण (सुतेषु) उत्पादितेषु स्वकीयसंतानेषु (नः) अस्माकम् (रारणत्) अतिशयेनोपदिशति। यङ्लुङन्तस्य ‘रण’धातोर्लेट्प्रयोगः। (सख्येषु) सखीनां कर्मसु भावेषु पुत्रस्त्रीभृत्यवर्गादिषु वा (च) समुच्चयार्थे॥५॥
Connotation: - अत्रोपमालङ्कारः। अस्मिन् जगति या या शोभा प्रशंसा ये च धन्यवादास्ते सर्वे परमेश्वरमेव प्रकाशयन्ते। कुतः, यत्र यत्र निर्मितेषु पदार्थेषु प्रशंसिता रचनागुणाश्च भवन्ति, ते ते निर्मातारं प्रशंसन्ति। तथैवेश्वरस्यानन्ता प्रशंसा प्रार्थना च पदार्थप्राप्तये क्रियते। परन्तु यद्यदीश्वरात्प्रार्थ्यते तत्तदत्यन्तस्वपुरुषार्थेनैव प्राप्तुमर्हति॥५॥
Reads times

MATA SAVITA JOSHI

N/A

Word-Meaning: - N/A
Connotation: - या मंत्रात उपमालंकार आहे. या जगात प्रशंसनीय, शोभायमान रचना दिसून येते ती परमेश्वराचीच प्रशंसा करण्यायोग्य असून धन्यवादास पात्र आहे. ती सर्व परमेश्वरी शक्तीला प्रकट करते. सिद्ध केलेल्या पदार्थात प्रशंसनीय रचनेचे अनेक गुण त्या पदार्थांच्या रचनाकाराच्या प्रशंसेचे हेतू आहेत. परमेश्वराची प्रशंसा त्याला जाणण्यासाठी व प्रार्थनेसाठी केली पाहिजे. त्यासाठी जे जे पदार्थ आपण ईश्वराची प्रार्थना करून मागू इच्छितो ते ते आपल्या पुरुषार्थानेच प्राप्त होतात. केवळ प्रार्थनेने प्राप्त होत नाहीत. ॥ ५ ॥