पदार्थान्वयभाषाः - (तिस्रः) तीन [देवियाँ अर्थात् १−इडा स्तुतियोग्य भूमि वा नीति, २−सरस्वती प्रशस्त विज्ञानवाली विद्या वा बुद्धि, ३−और भारती पोषण करनेवाली शक्ति वा विद्या] (ऋतस्य) सत्य शास्त्र के (पन्थाम् अनु) पथ पर (आ अगुः) चलती आयी हैं और (त्रयः) तीन (घर्माः) सींचनेवाले यज्ञ [अर्थात् देवपूजा, संगतिकरण और दान] (रेतः अनु) वीरता के साथ-साथ (आ अगुः) चलते आये हैं। (एका) एक [इडा] (प्रजाम्) प्रजा को (एका) एक [सरस्वती] (ऊर्जम्) पुरुषार्थ वा अन्न को (जिन्वति) भरपूर करती हैं, (एकाः) एक [भारती] (देवयूनाम्) दिव्यगुण प्राप्त करनेवाले [धर्म्मात्माओं] के (राष्ट्रम्) राज्य की (रक्षति) रक्षा करती है ॥१३॥
भावार्थभाषाः - धर्म्मात्मा पुरुषार्थी पुरुष वेदमार्ग पर चल कर पुरुषार्थपूर्वक प्रजा और राज्य की रक्षा करते हैं ॥१३॥ तीन देवियों के विषय में देखो-अ० ५।३।७। और ५।१२।८ ॥