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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
ब्रह्मविद्या का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (देवाः) विजय चाहनेवाले पुरुष (ताम् ऊर्जाम्) उस बलवती का (उप जीवन्ति) सहारा लेकर जीते हैं, (उपजीवनीयः) वह [दूसरों का] आश्रय (भवति) होता है, (यः एवम् वेद) जो ऐसा जानता है ॥४॥
भावार्थभाषाः - ईश्वरमहिमा से मनुष्य विजय पाते हैं, ऐसा जाननेवाला पुरुष सदा उपकारी होता है ॥४॥
टिप्पणी: ४−(उपजीवनीयः) अन्येषामाश्रयणीयः। अन्यत् पूर्ववत् ॥
