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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
ब्रह्मविद्या का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (सा उत् अक्रामत्) वह [विराट्] ऊपर चढ़ी, (सा) वह (मनुष्यान्) मनुष्यों में (आ अगच्छत्) आयी, (ताम्) उसको (मनुष्याः) मनुष्यों ने (उप अह्वयन्त) पास बुलाया,(इरावति) हे अन्नवती ! (आ इहि) तू आ, (इति) बस ॥९॥
भावार्थभाषाः - मननशील पुरुष ईश्वरशक्ति विराट् का विचार बड़े प्रेम से करते हैं ॥९॥
टिप्पणी: ९−(मनुष्यान्) मननशीलान् (इरावति) इण् गतौ−रन्। इरा=अन्नम्-निघ० २।७। हे अन्नवति। अन्यत् पूर्ववत् ॥
