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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
सब की रक्षा का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (अश्विना) हे सब कामों में व्यापक रहनेवाले माता पिता ! (धिये) सत् कर्म वा सत् बुद्धि के लिये (नः) हमारी (सम्) मिलकर (प्र) अच्छे प्रकार (अवतम्) रक्षा करो। (उरुज्मन्) हे विस्तीर्ण गतिवाले परमात्मन् ! (अप्रयुच्छन्) चूक न करता हुआ तू (नः) हमारी (उरुष्य) रक्षा कर। (द्यौः) हे प्रकाशमान (पितः) पिता परमेश्वर ! (या) जो (दुच्छुना) दुर्गति है [उसको] (यवय) तू हटा दे ॥३॥
भावार्थभाषाः - माता पिता इस प्रकार शिक्षा देवें जिस से उनके संतान ईश्वर आज्ञा पालन करके ऐश्वर्यवान् हों ॥३॥
टिप्पणी: ३−(धिये) धीः कर्मनाम−निघ० २।१। प्रज्ञानाम−निघ० ३।९। सत्कर्मणे सद्बुद्धये वा (सम्) संगत्य (अश्विना) सू० ३।३। कर्मसु व्यापनशीलौ मातापितरौ (प्र) प्रकर्षेण (अवतम्) रक्षतम् (नः) अस्मान् (उरुष्य) सू० ३।३। रक्ष (नः) (उरुज्मन्) सर्वधातुभ्यो मनिन् उ० ४।१४५। इति उरु+अज गतिक्षेपणयोः−मनिन्, अकारलोपः। हे विस्तीर्णगते परमात्मन् (अप्रयुच्छन्) अ० २।६।३। अप्रमाद्यन् (द्यौः) हे प्रकाशमान (पितः) पालक परमेश्वर (यवय) अपगमय (दुच्छुना) अ० ५।१७।४। दुर्गतिः (या) या, तामपि ॥
