पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
राजा के धर्म का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (यः) जो तू (गिरिषु) स्तुतियोग्य पुरुषों में (वीरुधाम्) विविध उत्पन्न प्रजाओं के बीच (बलवत्तमः) अत्यन्त बलवान् (अजायथाः) उत्पन्न हुआ है। (तक्मनाशन) हे दुःखित जीवन नाश करनेवाले (कुष्ठ) गुणपरीक्षक पुरुष (इतः) यहाँ से (तक्मानम्) दुःखित जीवन को (नाशयन्) नाश करता हुआ (आ इहि) तू आ ॥१॥
भावार्थभाषाः - प्रतापी राजा प्रजा के दुःखों का नाश करके उन्नति करे कुष्ठ वा कूट एक ओषधि का भी नाम है, जो राजयक्ष्म, कुष्ठ आदि रोगों को शान्त करती है] ॥१॥
टिप्पणी: १−(यः) यस्त्वम् (गिरिषु) कॄगॄशॄपॄ०। उ० ४।१४३। इति गृणातिः स्तुतिकर्मा−निरु० ३।५। इ प्रत्ययः। स्तूयमानेषु पूज्येषु पुरुषेषु (अजायथाः) त्वमुत्पन्नोऽभवः (वीरुधाम्) विरोहणशीलानां प्रजानां मध्ये (बलवत्तमः) अतिशयेन बलवान् (कुष्ठ) हनिकुषिनी०। उ० २।२। इति कुष निष्कर्षे−क्थन्। हे निष्कर्षक। गुणपरीक्षक पुरुष (आ इहि) आगच्छ (तक्मनाशन) हे कृच्छ्रजीवननाशक (तक्मानम्) अ० १।२५।१। कृच्छ्रजीवनम् (नाशयन्) निराकुर्वन् (इतः) अस्माद् देशात् ॥
