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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
दोषनिवारण के लिये उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (ताबुवम्) वृद्धि करनेवाली वस्तु (ताबुवम्) पीड़ा देनेवाली वस्तु (न) नहीं होती, (त्वम्) तू [सर्प] (घ इत्) अवश्य ही (ताबुवम्) दुःखनाशक वस्तु (न) नहीं (असि) है। (ताबुवेन) हमारी वृद्धि करनेवाले कर्म से (विषम्) तेरा विष (अरसम्) निर्बल हो जावे ॥१०॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य पुरुषार्थपूर्वक अपने दुष्ट भावों को नष्ट करे ॥१०॥
टिप्पणी: १०−(ताबुवम्) कृवापा०। उ० १।१। इति तु गतिवृद्धिहिंसासु−उण्+वा गतिगन्धनयोः−क। वृद्धिप्रापकं वस्तु (न) निषेधे (ताबुवम्) तु हिंसायाम्−उण्+वा गतौ−क। पीडाप्रापकं वस्तु (न) (घ) अवधारणे (इत्) एव (त्वम्) सर्पः (असि) (ताबुवम्) तु हिंसायाम्−उण्+वा गन्धने−क। दुःखनाशकं वस्तु (ताबुवेन) दुःखनाशकेन कर्मणा (अरसम्) निर्बलम् (विषम्) सरलम् ॥
