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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
वैरी के नाश का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (यः स्तेनः) जो कोई चोर (अद्य) आज (आयति) आवे, (संपिष्टः) चूर-चूर किया हुआ (सः) वह (अप अयति) हट जावे और (पथाम्) मार्गों के (अपध्वंसेन) विनाश से (एतु) चला जावे, (इन्द्रः) ऐश्वर्यवान् प्रतापी मनुष्य (वज्रेण) वज्र से (तम्) उसको (हन्तु) मार डाले ॥५॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य घर और रक्षकों का ऐसा प्रबन्ध करें कि यदि चोर आदि आ भी जावे तो मार्ग भूलकर निराश होकर भागने लगे, और राजा पकड़ कर उसे यथोचित दण्ड देवे ॥५॥
टिप्पणी: ५−(यः) (अद्य) अस्मिन् दिने (स्तेनः) म० ४। चोरः (आ-अयति) अय गतौ। आगच्छतु (सः) चोरः (संपिष्टः) पिष्लृ संचूर्णने-क्त। सर्वथा चूर्णीकृतः (अप-अयति) निर्गच्छतु (पथाम्) मार्गाणाम् (अपध्वंसेन) ध्वन्सु गतौ, अधः पतने-घञ्। विनाशेन (एतु) गच्छतु (इन्द्रः) ऐश्वर्यवान् पुरुषः (वज्रेण) अस्त्रभेदेन (हन्तु) मारयतु (तम्) चोरम् ॥
