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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
गर्भरक्षा का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - [हे गर्भिणी !] (ब्रह्मणा) विद्वान् वैद्य से (संविदानः) मेल रखता हुआ, (रक्षोहा) राक्षसों [रोगों] का नाश करनेवाला (अग्निः) अग्नि [अग्नि के समान रोग भस्म करनेवाला औषध] (इतः) यहाँ से [उस रोग को] (बाधताम्) हटावे, (यः) जो कोई (दुर्णामा) दुर्नामा [दुष्ट नामवाले बवासीर आदि रोग का कीड़ा] (अमीवा) पीड़ा होकर (ते) तेरे (गर्भम्) गर्भाशय [कोख] और (योनिम्) योनि [गुप्त उत्पत्तिमार्ग] को (आशये) घेर लेता है ॥११॥
भावार्थभाषाः - स्त्री की कोख और योनि के रोगजन्तुओं को विद्वान् वैद्यों की सम्मति से दूर करना चाहिये ॥११॥
टिप्पणी: मन्त्र ११-१६ ऋग्वेद में है-१०।१६२।१-६ ॥ इन मन्त्रों से मिलाओ-अ० का०८। सू० ६ ॥ ११−(ब्रह्मणा) विदुषा वैद्येन सह (अग्निः) अग्निसमानं रोगस्य भस्मीकरमौषधम् (संविदानः) ऐकमत्यं प्राप्तः (रक्षोहा) रक्षसां रोगाणां नाशकः (बाधताम्) हिनस्तु तं रोगम् (इतः) अस्मात् स्थानात् (अमीवा) पीडा (यः) (ते) तव (गर्भम्) गर्भाशयम् (दुर्णामा) अ० ८।६।१। दुर्णामा क्रिमिर्भवति पापनामा-निरु० ६।१२। अर्शआदिरोगजन्तुः (योनिम्) गुप्तोत्पत्तिमार्गम् (आशये) तलोपः। आशेते। प्राप्नोति ॥
