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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
सोम रस के सेवन का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (इन्द्र) हे इन्द्र ! [परम ऐश्वर्यवाले राजन् !] (ओजसा) अपने बल से (विश्वस्य) सबका (ईशानः) स्वामी (त्वम्) तू (पुरः) सामने से (प्र इहि) आगे बढ़। (वृत्रहन्) हे वैरियों के नाश करनेवाले ! (वृत्राणि) वैरियों को (जहि) नाश कर ॥३॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य महाबली होकर आगे बढ़ता हुआ सब विघ्नों को मिटावे ॥३॥
टिप्पणी: ३−(इन्द्र) (प्र) प्रकर्षेण (इहि) गच्छ (पुरः) अग्रतः (त्वम्) (विश्वस्य) सर्वस्य (ईशानः) स्वामी (ओजसा) स्वबलेन (वृत्राणि) शत्रून् (वृत्रहन्) हे शत्रुनाशक (जहि) नाशय ॥
