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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
रक्षा के प्रयत्न का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (ते) वे [दुष्ट] (सप्तऋषिवन्तम्) सात ऋषियों [हमारे कान आँख, नाक, जिह्वा, त्वचा पाँच ज्ञानेन्द्रियों मन, बुद्धि] के स्वामी (विश्वकर्माणम्) विश्वकर्मा [सबके बनानेवाले परमेश्वर] की (ऋच्छन्तु) सेवा करें। (ये) जो (अघायवः) बुरा चीतनेवाले (मा) मुझे (उदीच्याः) उत्तर वा बायीं (दिशः) दिशा से (अभिदासात्) सताया करें ॥७॥
भावार्थभाषाः - मन्त्र १ के समान है ॥७॥
टिप्पणी: ७−(विश्वकर्माणम्) सर्वस्रष्टारं परमेश्वरम् (सप्तऋषिवन्तम्) सू०१७। म०७। छन्दसीरः। पा०८।२।१५। मतुपो वः। मनोबुद्धिसहितपञ्चज्ञानेन्द्रियाणां स्वामिनम् (उदीच्याः) उत्तरस्याः वामस्थायाः। अन्यत् पूर्ववत् ॥
