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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
परमात्माकी व्यापकता का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (प्रजापतिः) प्रजापालक [राजा] (च च) और (परमेष्ठी) परमेष्ठी [सबसे ऊँचे पदवाला आचार्य वा संन्यासी] (च) और (पिता) बाप (च) और (पितामहः) दादा (च) और (आपः) सत्कर्म (च) और (श्रद्धा)श्रद्धा [धर्म मे प्रतीति] (वर्षम्) श्रेष्ठपन को (भूत्वा) पाकर (तम्) उस [व्रात्य परमात्मा] के (अनुव्यवर्तयन्त) पीछे विविध प्रकार वर्तमान हुए हैं ॥२॥
भावार्थभाषाः - सब शूर वीर ज्ञानी औरपूजनीय महात्मा संसार में उस परमात्मा ही का आश्रय लेकर श्रेष्ठ होते हैं॥२॥
टिप्पणी: २−(तम्) व्रात्यम् (आपः) आपः कर्माख्यायां ह्रस्वो नुट् च वा। उ० ४।२०८। आप्लृव्याप्तौ-असुन्। सुकर्म (श्रद्धा) धर्मविश्वासः (वर्षम्) वृतॄवदिवचि०। उ० ३।६२।वृञ् वरणे-स प्रत्ययः। वरत्वं श्रेष्ठताम् (भूत्वा) भू प्राप्तौ-क्त्वा।प्राप्य (अनुव्यवर्तयन्त) अनुसृत्य वर्तमाना अभवन्। अन्यत् पूर्ववत्-सू० ६। म०२५ ॥
