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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
व्रात्य के सामर्थ्य का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (तस्य) उस (व्रात्यस्य) व्रात्य [सत्यव्रतधारी अतिथि] के−(समानम्) एक से अर्थात् धार्मिक (अर्थम्) अर्थ [विचार] को (देवाः) विद्वान् लोग (परि) सब ओर से (यन्ति) प्राप्तकरते हैं, (च) और (व्रात्यम्) उस व्रात्य [सत्यव्रतधारी पुरुष] के (वै) निश्चयकरके (एतत्) इस प्रकार से (अनुपरियन्ति) पीछे घिर कर चलते हैं, [जैसे] (ऋतवः)ऋतुएँ (संवत्सरम्) वर्षकाल के [पीछे चलते हैं] ॥८॥
भावार्थभाषाः - जो सत्यव्रतधारीपरोपकारी संन्यासी हो, सब विद्वान् लोग उसी के न्याययुक्त वेदानुकूल मार्ग परचलें और सब मिलकर उसी से प्रीति करें, जैसे सब ऋतुएँ और महीने आदि वर्ष मेंमिले रहते हैं ॥८॥
टिप्पणी: ८−(समानम्) सम्+अन जीवने-घञ्। यद्वा सम्+आङ्+णीञ् प्रापणे-ड।एकम्। धार्मिकम् (अर्थम्) उषिकुषिगार्तिभ्यस्थन्। उ० २।४। ऋ गतिप्रापणयोः-थन्।विचारम्। प्रयोजनम् (परि) सर्वतः (यन्ति) प्राप्नुवन्ति (देवाः) विद्वांसः (संवत्सरम्) द्वादशमासात्मकं कालम् (वै) निश्चयेन (एतत्) अनेन प्रकारेण (ऋतवः)वसन्तादयः (अनुपरियन्ति) अनुसृत्य सर्वतः प्राप्नुवन्ति (व्रात्यम्)सत्यव्रतधारिणं पुरुषम् (च) समुच्चये ॥
