52 बार पढ़ा गया
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
व्रात्य के सामर्थ्य का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (तस्य) उस (व्रात्यस्य) व्रात्य [सत्यव्रतधारी अतिथि] की−(आहुतिः) आहुति [दानक्रिया] (एव)ही (एषाम्) इन [विद्वानों] का (एकम्) केवल (तत्) वह [प्रसिद्ध] (अमृतत्वम्)अमरपन [जीवन अर्थात् पुरुषार्थ] है−(इति) यह निश्चित है ॥१०॥
भावार्थभाषाः - जब विद्वान् संन्यासीअपने आत्मा को संसार की भलाई में लगा देता है, विद्वान् लोग उसकी मर्यादा कोमानकर पुरुषार्थ करते और क्लेशों को त्याग कर आनन्द भोगते हैं ॥१०॥
टिप्पणी: १०−(एकम्)केवलम् (तत्) प्रसिद्धम् (एषाम्) देवानाम्। विदुषाम् (अमृतत्वम्) अमरणम्।जीवनम्। पुरुषार्थम् (इति) एवं निश्चितम् (आहुतिः) समन्ताद् दानक्रिया (एव)अवधारणे ॥
