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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
यज्ञ करने में विद्वान् की सम्मति का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - वह (देवेषु) विद्वानोंके बीच (आ) थोड़ा भी (न वृश्चते) दोषी नहीं होता है, [तब] (अस्य) उस [गृहस्थ] का (हुतम्) यज्ञ (भवति) हो जाता है ॥६॥
भावार्थभाषाः - गृहस्थ को योग्य है किआदरपूर्वक विद्वान् मर्यादापुरुष सत्यव्रतधारी अतिथि की आज्ञा से उत्तम-उत्तमकर्म करता रहे, जिससे उसकी मर्यादा और कीर्ति संसार में स्थिर होवे ॥४-७॥
टिप्पणी: ६−(न) निषेधे (देवेषु)विद्वत्सु (आ) ईषत् (वृश्चते) वृश्च्यते। दूषितो भवति (हुतम्) हवनम्। यज्ञः (भवति) सिद्ध्यति ॥
