वांछित मन्त्र चुनें

आ दे॒वेषु॑वृश्चते अहु॒तम॑स्य भवति ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

आ । देवेषु । वृश्चते । अहुतम् । अस्य । भवति ॥१२.१०॥

अथर्ववेद » काण्ड:15» सूक्त:12» पर्यायः:0» मन्त्र:10


55 बार पढ़ा गया

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

यज्ञ करने में विद्वान् की सम्मति का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - वह (देवेषु) विद्वानोंके बीच (आ) सर्वथा (वृश्चते) दोषी होता है, और (अस्य) उस [गृहस्थ] का (अहुतम्)कुयज्ञ (भवति) हो जाता है ॥१०॥
भावार्थभाषाः - जो अयोग्य गृहस्थनीतिज्ञ वेदवेत्ता अतिथि की आज्ञा बिना मनमाना काम करने लगता है, वह अनधिकारीहोने से शुभ कार्य सिद्ध नहीं कर सकता और न लोग उसकी कुमर्यादा को मानते हैं॥८-११॥
टिप्पणी: १०−(आ) समन्तात् (अहुतम्) कुयज्ञः। अन्यत् पूर्ववत्-म० ६ ॥