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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
अतिथिसत्कार के विधान का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (यत्) जब (एनम्) इस [अतिथि] से (आह) वह [गृहस्थ] कहता है−(व्रात्य) हे व्रात्य ! [उत्तम व्रतधारी] (यथा) जैसे (ते) तेरा (वशः) प्रधानत्व हो, (तथा अस्तु इति) वैसा होवे−(तेन) उस [सत्कार] से (एव) निश्चय करके (वशम्) प्रधानत्व को (अव रुन्द्धे) वह [गृहस्थ] सुरक्षित करता है ॥८॥
भावार्थभाषाः - गृहस्थ अतिथि की प्रधानता मानने से अपनी प्रधानता को दृढ़ करे ॥८॥
