वांछित मन्त्र चुनें

यदे॑न॒माह॒व्रात्य॑ त॒र्पय॒न्त्विति॑ प्रा॒णमे॒व तेन॒ वर्षी॑यांसं कुरुते ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

यत् । एनम् । आह । व्रात्य । तर्पयन्तु । इति। प्राणम् । एव । तेन । वर्षीयांसम् । कुरुते ॥११.५॥

अथर्ववेद » काण्ड:15» सूक्त:11» पर्यायः:0» मन्त्र:5


66 बार पढ़ा गया

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

अतिथिसत्कार के विधान का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (यत्) जब (एनम्) इस [अतिथि] से (आह) [वह गृहस्थ] कहता है−(व्रात्य) हे व्रात्य ! [सद्व्रतधारी] (तर्पयन्तु इति) वे [यह पदार्थ तुझे अथवा आप हमें] तृप्त करें−(तेन) उस [सत्कार] से (एव) निश्चय करके (प्राणम्) अपने प्राण [जीवन] को (वर्षीयांसम्) अधिक बड़ा (कुरुते) वह [गृहस्थ] करता है ॥५॥
भावार्थभाषाः - गृहस्थ लोग अतिथि महात्माओं का सत्कार करके उनके सदुपदेश से अपना जीवन उत्तम बनावें ॥५॥इस मन्त्र का अन्तिम भाग ऊपर आया है अ० ९।६(२)।२ ॥