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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
अतिथिसत्कार के विधान का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (यत्) जब (एनम्) इस [अतिथि] से (आह) [वह गृहस्थ] कहता है−(व्रात्य) हे व्रात्य ! [सद्व्रतधारी] (तर्पयन्तु इति) वे [यह पदार्थ तुझे अथवा आप हमें] तृप्त करें−(तेन) उस [सत्कार] से (एव) निश्चय करके (प्राणम्) अपने प्राण [जीवन] को (वर्षीयांसम्) अधिक बड़ा (कुरुते) वह [गृहस्थ] करता है ॥५॥
भावार्थभाषाः - गृहस्थ लोग अतिथि महात्माओं का सत्कार करके उनके सदुपदेश से अपना जीवन उत्तम बनावें ॥५॥इस मन्त्र का अन्तिम भाग ऊपर आया है अ० ९।६(२)।२ ॥
