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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
अतिथिसत्कार के विधान का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (यत्) जब (एनम्) इस [अतिथि] से (आह) वह [गृहस्थ] कहता है−(व्रात्य) हे व्रात्य ! [सत्यव्रतधारी] (यथा) जैसी (ते) तेरी (निकामः) लालसा [निश्चितकामना] हो, (तथा अस्तु इति) वैसाहोवे−(तेन) उस [सत्कार] से (एव) निश्चय करके (निकामम्) अपनी लालसा को (अवरुन्द्धे) वह [गृहस्थ] सुरक्षित करता है ॥१०॥
भावार्थभाषाः - गृहस्थ अतिथि कीविद्यावृद्धि आदि लालसा पूरी करने से अपनी लालसाओं की पूर्ति का उपाय जाने॥१०॥
टिप्पणी: १०−(निकामः) निश्चितकामः। लालसा (निकामम्) लालसाम्। अन्यत् पूर्ववत् ॥
