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यदे॑न॒माह॒व्रात्य॒ यथा॑ ते निका॒मस्तथा॒स्त्विति॑ निका॒ममे॒व तेनाव॑ रुन्द्धे ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

यत् । एनम् । आह । व्रात्य । यथा । ते । निऽकाम: । तथा । अस्तु । इति । निऽकामम् । एव । तेन । अव । रुन्ध्दे ॥११.१०॥

अथर्ववेद » काण्ड:15» सूक्त:11» पर्यायः:0» मन्त्र:10


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

अतिथिसत्कार के विधान का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (यत्) जब (एनम्) इस [अतिथि] से (आह) वह [गृहस्थ] कहता है−(व्रात्य) हे व्रात्य ! [सत्यव्रतधारी] (यथा) जैसी (ते) तेरी (निकामः) लालसा [निश्चितकामना] हो, (तथा अस्तु इति) वैसाहोवे−(तेन) उस [सत्कार] से (एव) निश्चय करके (निकामम्) अपनी लालसा को (अवरुन्द्धे) वह [गृहस्थ] सुरक्षित करता है ॥१०॥
भावार्थभाषाः - गृहस्थ अतिथि कीविद्यावृद्धि आदि लालसा पूरी करने से अपनी लालसाओं की पूर्ति का उपाय जाने॥१०॥
टिप्पणी: १०−(निकामः) निश्चितकामः। लालसा (निकामम्) लालसाम्। अन्यत् पूर्ववत् ॥