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यः पृ॑थि॒वींबृह॒स्पति॑म॒ग्निं ब्र॑ह्म॒ वेद॑ ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

य: । पृथिवीम् । बृहस्पतिम् । अग्निम् । ब्रह्म । वेद ॥१०.९॥

अथर्ववेद » काण्ड:15» सूक्त:10» पर्यायः:0» मन्त्र:9


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

अतिथिसत्कार की महिमा का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (यः) जो [पुरुष] (पृथिवीम्) पृथिवी [पृथिवी के राज्य] को (बृहस्पतिम्) बड़े-बड़े प्राणियों कारक्षक गुण, और (ब्रह्म) ब्रह्मज्ञानी समूह को (अग्निम्) अग्नि [अग्निसमानतेजोमय] (वेद) जानता है ॥९॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य प्रजापालक औरअतिथिसत्कारक होकर वेदज्ञानियों के साथ विराजकर ब्रह्मवर्चसी होवे ॥८, ९॥
टिप्पणी: ९−(यः)पुरुषः (पृथिवीम्) भूमिराज्यम् (बृहस्पतिम्) महतां प्राणिनां रक्षकगुणम् (अग्निम्) अग्निवत्तेजोमयम् (ब्रह्म) वेदज्ञानिकुलम् (वेद) जानाति ॥