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शर्म॒ वर्मै॒तदाह॑रा॒स्यै नार्या॑ उप॒स्तिरे॑। सिनी॑वालि॒ प्र जा॑यतां॒ भग॑स्य सुम॒ताव॑सत्॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

शर्म । वर्म । एतत् । आ । हर। अस्यै । नार्यै । उपऽस्तरे । सिनीवालि । प्र । जायताम् । भगस्य । सुऽमतौ । असत् ॥२.२१॥

अथर्ववेद » काण्ड:14» सूक्त:2» पर्यायः:0» मन्त्र:21


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

गृहआश्रम का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - [हे विद्वान् !] (एतत्) यह [गृहकार्यरूप] (शर्म) सुखदायक (वर्म) कवच (अस्यै नार्यै) इस नारी को (उपस्तिरे) ओढ़ने के लिये (आ हर) ला। (सिनीवालि) हे अन्नवाली पत्नी ! [तुझ से] (प्र जायताम्) उत्तम सन्तान उत्पन्न होवे, और वह [सन्तान] (भगस्य) भगवान् [ऐश्वर्यवान् परमात्मा] की (सुमतौ) सुमति में (असत्) रहे ॥२१॥
भावार्थभाषाः - पति आदि सब वधू को गृहकार्य में सदा सहाय देवें, जैसे योद्धा को कवच रणक्षेत्र में सहाय देता है, औरसब पुरुष उस वधू के वीर ईश्वरभक्त सन्तान से सुख प्राप्त करें ॥२१॥इस मन्त्र काउत्तरार्द्ध ऊपर मन्त्र १५ में आचुका है ॥
टिप्पणी: २१−(शर्म) सुखप्रदम् (वर्म) कवचम् (एतत्) (आ हर) आनय (अस्यै) (नार्यै) (उपस्तिरे) अवचक्षे च। पा० ३।४।१५। स्तृञ्स्तॄञ् आच्छादने-एश् प्रत्ययो बाहुलकात् तुमर्थे। उपस्त्रे। उपस्तर्तुम्।आच्छादयितुम्। अन्यद् व्याख्यातम्-म० १५ ॥