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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
गृहआश्रम का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (यदा) जब (इयम् वधू)इस वधू ने (गार्हपत्यम्) गृहस्थसम्बन्धी (अग्निम्) अग्नि को (पूर्वम्) पहिले से (असपर्यैत्) सेवन किया है। (अध) इसलिये (नारि) हे नारी ! (सरस्वत्यै) सरस्वती [विज्ञान के भण्डार परमेश्वर] को (च) और (पितृभ्यः) पितरों [पिता समान मान्यपुरुषों] को (नमः) नमस्कार (कुरु) कर ॥२०॥
भावार्थभाषाः - जिस परमेश्वर की औरजिन महान् पुरुषों की कृपा से इस वधू ने हवन, शिल्प, अन्न, ओषधि आदि में अग्निकी विद्या को यथावत् जाना है, उस परमेश्वर और उन बड़े लोगों को वह कुलवधू सदाधन्यवाद देती रहे ॥२०॥
टिप्पणी: २०−(यदा) यस्मिन् काले (गार्हपत्यम्) गृहपतिसंबन्धिनम् (असपर्यैत्) असपर्यत्। सेवितवती (पूर्वम्) अग्रे (अग्निम्) अग्निविद्याम् (वधू) (इयम्) (अध) अथ (सरस्वत्यै) सरो विज्ञानं विद्यते यस्यां चितौ सा सरस्वती, तस्यै। सर्वविज्ञानवते परमेश्वराय (नारि) हे नरस्य पत्नि (पितृभ्यः)पितृतुल्यमान्येभ्यः (च) (नमः) नमस्कारम् (कुरु) ॥
