वांछित मन्त्र चुनें

अदे॑वृ॒घ्न्यप॑तिघ्नी॒हैधि॑ शि॒वा प॒शुभ्यः॑ सु॒यमा॑ सु॒वर्चाः॑। प्र॒जाव॑तीवीर॒सूर्दे॒वृका॑मा स्यो॒नेमम॒ग्निं गार्ह॑पत्यं सपर्य ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अदेवृऽघ्नी । अपतिऽघ्नी । इह । एधि । शिवा । पशुऽभ्य: । सुऽयमा । सुऽवर्चा: । प्रजाऽवती । वीरऽसू: । देवृऽकामा । स्योना । इमम् । अग्निम् । गार्हऽपत्यम् । सपर्य ॥२.१८॥

अथर्ववेद » काण्ड:14» सूक्त:2» पर्यायः:0» मन्त्र:18


109 बार पढ़ा गया

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

गृहआश्रम का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - [हे वधू !] (इह) यहाँ [गृहाश्रम में] (अपतिघ्नी) पति को न सतानेवाली, (अदेवृघ्नी) देवरों को न कष्टदनेवाली, (शिवा) मङ्गल करनेवाली, (पशुभ्यः) के लिये (सुयमा) सुन्दर नियमोंवाली (सुवर्चाः) बड़े तेजवाली (एधि) हो। (प्रजावती) श्रेष्ठ प्रजाओं [सेवक आदि]रखनेवाली, (वीरसूः) वीरों की उत्पन्न करनेवाली, (देवृकामा) देवरों से प्रीतिकरनेवाली, (स्योना) सुखयुक्त तू (गार्हपत्यम्) गृहस्थसम्बन्धी (इमम्) इस (अग्निम्) अग्नि को (सपर्य) सेवन कर ॥१८॥
भावार्थभाषाः - गृहिणी को चाहिये किअपने पति और सब कुटुम्बियों और पशुओं को प्रसन्न रखकर उत्तम सन्तान उत्पन्न करेऔर गृहकार्य की सिद्धि के लिये शिल्पकर्म, हवनकर्म और पाकक्रिया आदि में अग्निका यथावत् प्रयोग करती रहे ॥१८॥
टिप्पणी: १८−(अदेवृघ्नी) देवॄणामहिंसित्री (अपतिघ्नी) (इह)अस्मिन् गृहाश्रमे (एधि) भव (शिवा) हितकरी (पशुभ्यः) गवादिभ्यः (सुयमा)शोभननियमयुक्ता (सुवर्चाः) बहुतेजाः (प्रजावती) श्रेष्ठसेवकादिभिः युक्ता (देवृकामा) म० १७ (स्योना) (इमम्) प्रसिद्धम् (अग्निम्) भौतिकमग्निम् (गार्हपत्यम्) गृहपतिसम्बन्धिनम् (सपर्य) सपर्यतिः परिचरणकर्मा-निघ० ३।५। सेवस्व॥