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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
मन्त्र १-५, प्रकाश करने योग्य और प्रकाशक के विषय काउपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (सोमः) हे चन्द्रमा ! (यत्) जब (त्वा) तुझको (प्रपिबन्ति) वे [किरणें] पी जाती हैं, (ततः) तब (पुनः)फिर (आ प्यायसे) तू परिपूर्ण हो जाता है। (वायुः) पवन (सोमस्य) चन्द्रमा का (रक्षिता) रक्षक है और (मासः) सबका परिमाण करनेवाला [परमेश्वर] (समानाम्) अनुकूलक्रियाओं का (आकृतिः) बनानेवाला है ॥४॥
भावार्थभाषाः - जब चन्द्रमा के रस कोसूर्य की किरणें खीच लेती हैं, वह रस पृथिवी पर किरणों द्वारा आता और पदार्थोंको पुष्ट करता है, फिर वह पार्थिव रस किरणों से वायु द्वारा खिंचकर चन्द्रमा कोपहुँचता है। इस प्रकार चन्द्रमा ईश्वरनियम से प्राणियों का सदा उपकारी होता है॥४॥यह मन्त्र कुछ भेद से ऋग्वेद में है−१०।८५।५ ॥
टिप्पणी: ४−(यत्) यदा (त्वा) (सोमः) हेचन्द्र (प्रपिबन्ति) आकर्षन्ति रश्मयः (ततः) अनन्तरम् (आ प्यायसे) प्रवर्द्धसे (पुनः) (वायुः) (सोमस्य) चन्द्रस्य (रक्षिता) रक्षकः (समानाम्) सम्-टाप्।अनुकूलानां क्रियाणाम् (मासः) मसी परिमाणे परिणामे च-घञ्। परिमाणकर्ता (आकृतिः)अकर्ता। रचयिता ॥
