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नवो॑नवो भवसि॒जाय॑मा॒नोऽह्नां॑ के॒तुरु॒षसा॑मे॒ष्यग्र॑म्। भा॒गं दे॒वेभ्यो॒ विद॑धास्या॒यन्प्र च॑न्द्रमस्तिरसे दी॒र्घमायुः॑ ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

नवऽनव: । भवसि । जायमान:। अह्नाम् । केतु:। । उषसाम् । एषि । अग्रम् । भागम् । देवेभ्य: । वि । दधासि । आऽयन् । प्र । चन्द्रम: । तिरसे । दीर्घम् । आयु: ॥१.२४॥

अथर्ववेद » काण्ड:14» सूक्त:1» पर्यायः:0» मन्त्र:24


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

विवाह संस्कार का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (चन्द्रमः) हेचन्द्रमा ! तू [शुक्ल पक्ष में] (नवोनवः) नया-नया (जायमानः) प्रकट होता हुआ (भवसि) रहता है, और (अह्नाम्) दिनों का (केतुः) जतानेवाला तू (उषसाम्) उषाओं [प्रभात वेलाओं] के (अग्रम्) आगे (एषि) चलता है और (आयन्) आता हुआ तू (देवेभ्यः)उत्तम पदार्थों को (भागम्) सेवनीय उत्तम गुण (वि दधासि) विविध प्रकार देता है और (दीर्घम्) लम्बे (आयुः) जीवनकाल को (प्र) अच्छे प्रकार (तिरसे) पार लगाता है॥२४॥
भावार्थभाषाः - चन्द्रमा शुक्लपक्षमें एक-एक कला बढ़कर नया-नया होता है, और दिनों अर्थात् प्रतिपदा आदि चान्द्रतिथियों को बनाता, और पृथिवी के पदार्थों में पुष्टि देकर प्राणियों का जीवनबढ़ाता है, इसी प्रकार स्त्री-पुरुष संसार में उपकार करके अपना जीवन सुफल करें॥२४॥
टिप्पणी: २४-अयं मन्त्रो व्याख्यातः-अ० ७।८१।२ ॥