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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
परमात्मा और जीवात्मा के विषय का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (सूर्य) हे चराचर प्रेरक [परमेश्वर !] तू (बट्) सत्य-सत्य (महान्) महान् [बड़ा] (असि) है, (आदित्य) हे अविनाशी ! तू (बट्) ठीक-ठीक (महान्) महान् [पूजनीय] (असि) है। (महतः ते) तुझ बड़े की (महिमा) महिमा (महान्) बड़ी है, (आदित्य) हे प्रकाशस्वरूप ! (त्वम्) तू (महान्) बड़ा (असि) है ॥२९॥
भावार्थभाषाः - जिस परमात्मा के बड़े होने को संसार में बड़े से बड़े भी मानते हैं, हे मनुष्यो ! उसकी उपासना करके प्रयत्न से अपने को बढ़ाओ ॥२९॥यह मन्त्र कुछ भेद से ऋग्वेद में है−८।९१।११, यजु० ३३।३९, और साम० पू० ३।९।४। तथा उ० ९।१।९ ॥
टिप्पणी: २९−(बट्) बट वेष्टनसामर्थ्यादिषु-क्विप्। सत्यम्-निघ० ३।१० (महान्) विशालः। पूजनीयः (असि) (सूर्य) सर्वप्रेरक परमेश्वर (बट्) (आदित्य) हे अविनाशिन् (महान्) (असि) (महान्) (ते) तव (महतः) पूजनीयस्य (महिमा) महत्त्वम् (त्वम्) (आदित्य) हे आदीप्यमान परमेश्वर (महान्) (असि) ॥
